अचानक – शाहाना परवीन

कविता

अचानक
—————–
अचानक वो आ गया एक दिन मेरे सामने,
मुसकुराकर बोला करनी है कुछ बात आमने – सामने।

मै समझ नहीं पाई और अचानक मै घबराई,
उसने धीरे से कहा करनी है कुछ बात मेरे सामने।

उसकी आवाज़ मीठी और अजीब सी कशीश थी ,
मैं नहीं “ना”कर पाई और बोल बैठी करो बात मेरे सामने।

अचानक नीचे मुह कर वह बोला, करता है मुझे पसंद,
मेरी हर बात पर प्रतिदिन रखता है नज़र,
उसे पसंद है मेरी आदतें और मेरा व्यवहार।
उसके शब्द सुनकर मै नहीं बोल पाई कि करो बात मेरे सामने।

मैं कुछ कहती उससे पहले ही अचानक भैया वहाँ आ गए,
अचानक भाषण पर भाषण दोनों को सुना गए।
हम दोनो कुछ कहते उससे पहले ही भैया बोल पड़े,
करो कुछ बात अब अपना मुह खोलो तुम मेरे सामने।।

अचानक वह लड़का बोला और नहीं घबराया,
भैया करता हूँ प्रेम आपकी बहन से नहीं वह शर्माया।
अचानक सुनकर उसके मुख से ऐसी बातें,
मैं डरी और रोने लगी हाथो से छुट गई सारी किताबें।

अचानक भैया मुसकुराए और प्यार से मुझे गले लगाया,
तुम हो मेरी प्यारी बहना, जो कहोगी तुम होगा वही बहना।

घबराते नहीं ऐसी बातों से हिम्मत से काम लेते हैं,
ऐसी बातों पर विचारते हैं सब बैठकर आमने सामने।।

शाहाना परवीन…✍️
पटियाला पंजाब

उपरोक्त कविता मेरे द्वारा लिखी गई है। मौलिक व अप्रकाशित रचना है।
शाहाना परवीन…✍️
पटियाला पंजाब

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *