अस्तित्व – Sarita om

आज एक दृश्य ने मन को मोह लिया, और पीछे से एक प्रश्न भी छोड़ा,,,,,
बस शब्दों के माध्यम से तस्वीर उपस्थित करने की कोशिश करती हूं आप सब बताइएगा कि कहां तक सक्षम हो पाई हूं मैं…….

दोपहर का समय , चिलचिलाती धूप में
एक लड़का लगभग,४सालऔर लड़की लगभग६साल
दौड़ रहे सड़क पर कुछ बड़ी-बड़ी गाड़ियों के आसपास चक्कर काट रहे हैं।।
बाबूजी दे दो , भगवान भला करे।
पैर पकड़ते हुए और शीशे के अंदर बैठे उस इंसान को लगभग शीशे से लगकर मतलब अपना चेहरा उसी शीशे
पे गड़ा कर लड़की मांगते हुए आंखों में
कुछ थोड़ा सा ही मिल जाए
ऐसी लालसा से बस

घूरे जाती है, अदंर के उस इंसान से दिखने वाले
प्राणी से जिसके लिए वह दिखाई ही न
पड़ रही हो।
काफी देर हुई पसीने को अपनी
मटमैली सी बदबूदार फ्राक में सुखा के
एक दमदार आवाज “ए ,हट जा वहां से ,,
नहीं तो एक कन्टाप पड़ेगा,चल भाग यहां से।।

सहसा अलग हटकर डर को आंखो में समेटे दूर खड़ी हो गई कि अचानक आंखो में फिर से चमक आती है और
दौड़ती है
लड़के का हाथ पकड़ दूसरी कार जो आ रही थी उस
में कुछ पाने की आस में
उसमें भी वही सब
तब राह चलता एक व्यक्ति आया है
और दो रूपए टिकाता है उसे
लड़की की आंखें ,चमक उठती है
बस तुरंत पास की दुकान से
एक पारले लेकर
लड़के को थमाते हुए बोली
“लो खालो ,मैं पानी लाती हूं”
बस यही से शुरूआत होती है एक नारी के नींव की
जो बस सब करती है अपनों के हित
पर बदले में क्या पाती है उम्र भर
तो क्या उसको बदलना चाहिए उसका
रचा गया बरसों का ये अस्तित्व या
बदले में सिर्फ त्याग,समर्पण,और हाड़-तोड़ मेहनत
जिसका किसी के लिए कोई मोल नहीं।।

आप बताएं??

सरिता

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