आर्यावत – कहानी सर्वप्रथम हिन्दू की पार्ट 1

कहानी के बारे में 

ये कहानी एक ऐसे मानव की है जो ना सिर्फ दुनिया का पहला मानव था बल्कि वह पहला हिन्दू भी था उसका नाम था आर्य जिसके नाम से भारत को आर्यावत के नाम से जाना जाने लगा। फिर आर्यावत कई हिस्सों में बंट गया और राजा भरत के बाद इसका नाम पड़ा “भारत” लेकिन क्या आप पहले हिन्दू की कहानी सुनना चाहेगे? ये कहानी काल्पनिकता और ऐतिहासिक तथ्यों का समावेश है इसलिए इसके कुछ तथ्य झूठे और कुछ सच्चे प्रतीत हो सकते है

लेखक की कलम से 

मेरा नाम रोहित सिंह है। मेरा पहला उपन्यास कालचक्र की राजकुमारी को आप लोगो ने काफी प्यार दिया जिसका आप सभी को धन्यवाद। आर्यावत कहानी सर्वप्रथम हिन्दू की ये मेरा दूसरा उपन्यास है। पहला उपन्यास तिलस्मी था तो ये दूसरा उपन्यास ऐतिहासिक रुपरेखा को आपके सामने प्रस्तुत करेगा। भाषा शैली मैने सामान्य और थोड़ी बोलचाल वाली रखी है जिससे पाठक ऐतिहासिक परिपेक्ष्य को भी ठीक से समझ सके। 

कहानी की पृष्ठभूमि 

ये कहानी शुरू होती है लगभग 65 करोड़ वर्ष पहले, जिसे हम ट्राइएसिक काल भी कहते है। पृथ्वी पर सिर्फ डायनासोर का अधिपत्य था। इस काल में भी इंसान दो प्रजातियों में था पहला आदि मानव और दूसरा आर्यमानव।

जंहा एक तरफ एक समाज जानवरो की तरह रहता था वंही दूसरी तरफ अर्यमानव सभ्य और पाकृतिक रहस्यों को जानकार उनपर शोध भी करने लगा था कई इतिहासकारो का मानना है की मानव के पूर्वज बंदर थे लेकिन कुछ इतिहासकार इसे नकार देते है क्योंकि कुछ इतिहासकार आदिमानव के तथ्यों को समझ रहे थे तो कुछ आर्यमानव के तथ्यों को समझ रहे है कई करोड़ो साल बीत जाते है

एक तरफ एक समाज अब भी जानवरो की तरह जी रहा था और दूसरी तरफ आर्यसमाज ने एक सकीर्ण बस्ती स्थापित कर ली थी। कई इतिहासकार का मानना है की आर्य लोग यूरोप से भारत में आये थे तो कुछ इतिहासकार भारत को ही आर्य लोगो की धरती मानते है। लेकिन अगर मैं अपनी बात करू तो मेरा नाम आर्य था हमारे आर्यसमाज में नाम रखने की प्रथा नहीं थी

हम सभी एक दूसरे को आर्य ही कहते थे ये हमारे एकीकरण को स्थापित करके रखता है। हमने सबसे पहले ये तय किया की इस मत्स्य काल में सभ्य समाज तभी स्थापित हो सकता है जब हम अपना राजा चुने। ये समाज इतना छोटा था की हमने सबसे पहले प्रत्यक्ष लोकतंत्र की नींव रखी और अपने राजा को नाम दिया आर्य मनु मतलब आर्य समाज का पहला मानव या यूँ कहे की इस दुनिया का पहला हिन्दू। “जी हाँ” ये ही मै हूँ मेरा नाम है मनु और मेरी कहानी यही से शुरू होती है। 

आर्य का भारत आगमन 

फिर वो समय आ गया जिसमे हमारे आर्य लोगो को पता चल गया की अब सृष्टि में प्रलय आने वाली है। आर्य समाज  को पता चल गया था की ये संसार काफी रहस्यों से भरा हुआ है। मैने आर्य समाज से सात सबसे ज्ञानी पुरुषो की एक पीठ बनाई जिन्हे हमने सप्तऋषि का नाम दिया। मेरी इस ज्ञानी पीठ ने ये पता लगा लिया की अंतरिक्ष से 40 किलोमीटर के व्यास वाला एक पिंड पृथ्वी से जम्बूदीप के हिस्से में आ टकराएगा जिससे हाईड्रोजन बम विस्फोट से 10 हजार गुना अधिक असर होगा। 

सुनामी आएगी और पृथ्वी पर कई ज्वालामुखी फट पड़ेंगे। महीनों तक आसमान में गैस की परतें छाई रहीं-अंधेरा छाया बनी रहेंगी। इतने दिनों तक सूर्य की किरणें पृथ्वी तक नहीं पहुंच सकीं और चरम खाद्य संकट आ खड़ा हो जायेगा। ऐसे में भुखमरी के चलते पृथ्वी के भारी-भरकम जीव नष्ट हो जानेंगे। सिर्फ वही बच पाएंगे जो सूक्ष्म है और समझदार है। मै अपनी कुटिया में बैठा यही सोच रहा था तभी सप्तऋषियों की पीठ मेरी कुटिया में प्रवेश करके कुर्सियों पर बैठ जाते है। 

प्रलय आने वाली है आर्य मनु! सप्तऋषियों ने एक साथ कहा। 

हमारे पास कितना समय है? मनु ने एक बेचैनी में पूछा। 

कुछ महीने ही! सप्तऋषियों ने जबाब दिया। 

ठीक है आर्य समाज में फैला दो की जो भी कुशल कारीगर है वो सब एक विशाल नाव बनाने के कार्य में जुट जाये हम लोग समुंद्री रास्ते से होते हुए जम्बूदीप की तरफ ही रवाना होंगे? सभी लोग अपना अनाज, फल और अन्य वस्तुओं को इक्क्ठा करे! मनु ने सोचते हुए जबाब दिया। 

लेकिन हम लोग जम्बूदीप की तरफ ही रवाना क्यों हो रहे है ये जानते हुए की वो विस्फोट भी वंही होने वाला है! सप्तऋषियों ने चौंकते हुए पूछा। 

मै मानता हूँ की विस्फोट वंही होगा लेकिन उसका प्रभाव एक लहर की तरह विश्व पर फैलेगा। जो सबसे पास होगा उसपर प्रभाव भी सबसे कम होगा और जो जितना दूर होगा उसपर प्रभाव भी ज्यादा होगा। प्रभाव की वजह से धरती टूटकर उसी तरफ जाएगी और वातावरण भी सबसे अच्छा वंही पाया जायेगा। अगर हम बात करे तो अभी हम विश्व में मध्यांतर में स्थित है। 

तो क्या हम डायनासोर को भी उस नाव में ले जाएंगे? 

नहीं! वो आकर में बढे होते है उनका बच पाना मुमकिन नहीं है। 

तो हम किस जीवो को सरक्षण दे?

इसके लिए आप एक सूची बनाइये और उसी तरह से नाव में कमरे बनवाइए। 

ठीक है! इतना कहकर सप्तऋषि चले जाते है। 

कुछ महीने बीत जाते है जगहों जगहों पर धमाकों की आवाजे आ रही थी। चारो तरफ धुंआ छाया हुआ था। ज्वलामुखी फट रहे थे। धरती फट रही थी और समुन्द्र में सुनामी आ चुकी थी। 

नाव बना चुके थे पकृति के नियमो से बंधे हुए विश्व में इंसानियत को बचाने की ज़िम्मेदारी मेरी ही थी। मै उनका राजा था और ये मेरी प्रजा। मुझे पता नहीं की ये राजशाही अवधारणा मेरे मन में कैसे शुरू हुई लेकिन मुझे पता था मेरे कुटुम्ब के आलावा भी कंही और इंसानियत पनप रही थी और उसे बचाने की जिम्मेदारी भी मेरी ही थी। हमे खेती करना, शिकार करना, औजार निर्माण और घर निर्माण जैसे कार्यो को करना आता था शायद ये दुनिया की पहली समुंद्री यात्रा थी

ये यात्रा पांच महीनो तक चली। धीरे धीरे खाद्य पदार्थ भी हमारे कम हो गए थे हो गए थे जड़ी बुटिया खत्म हो रही थी। मेरे लोगो का मनोबल कम हो रहा था। वह समझ नहीं पा रहे थे की ये ना खत्म होने वाला समुन्द्र हमे किसी तट तक पहुंचा देगा या नहीं। 

मैने अपने लोगो को हौसला रखने की सलाह दे रहा था। तभी मुझे विश्वास हुआ की समुन्द्र में भी जवालामुखी फटेगा क्योंकि समुन्द्र में कंही ना कंही लावा फुट पड़ा था। समुन्द्र का पानी उफान मार रहा था। आसमान काला हो चूका था। मानो मौत अब हमारे नजदीक आ चुकी हो। 

मेने जोर से चिल्लाया “हे ईश्वरीय शक्ति, मुझे पता है पकृति बहुत दयालु है और हम उसके बच्चे है तो हमे संरक्षण दीजिये प्रभु”

मेरे इतना कहते ही एक विशाल मछली समुन्द्र से ऊपर की तरफ उछाल मारने लगी वह मछली हमारी नाव से भी बढ़ी थी हमने सबने उसे ईश्वर का मत्स्य अवतार माना। अवतार मानने की पहल मेने ही की और ये आह्वाहन ईश्वर को बुलाने का मंत्र भी माना गया हम सबने एक विशाल रस्सी का निर्माण किया और उस मछली की तरफ उसका एक छोर फेंका तो उसने उस छोर को अपने मुंह में दबा लिया और हमारी नाव को खींचते हुए उस समुंद्री सुनामी से बाहर ले गई। 

पलक झपकते ही वो मछली हमे उस अंधकार से उजाले में ले आई लग रहा था मानो वो हमे एक अलग ही दुनिया में ले आई थी। सामने हमे एक विशाल तट नजर आ रहा था। वातावरण शांत था। पक्षी कलोल कर रहे थे। हम सभी में हर्षोउल्लास भरा हुआ था। हम सामान लेकर तट पर उतरे और एक पैदल यात्रा शुरू कर दी। 

2 Replies to “आर्यावत – कहानी सर्वप्रथम हिन्दू की पार्ट 1”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *