इयरफोन

-मणि”सयंमी”

सूरज धरा के आँचल को और सुनहरा करने को अपनी चमकती किरणों को भरी दोपहरी के रूप मे टाँकने लगा

इधर अम्माजी अपने कमरे मे L.E.D.मे अपने समय की Old is Gold मूवी देखते हुए जम्हाईया लेने लगी

औऱ सोचने लगी एक उम्र मे इतना काम था कि दोपहर मे अखबार की दो खबरें पढ़ी नही कि पास सोते बच्चो को अपने मे समेट कर सो जाती थी

औऱ फिर से सारे कामो मे लगकर रात तक थक के चूर हो जाती थी और कब सुबह का अलार्म बज जाता था पता ही नही चलता था

अब तो कोई काम नही तो कोई थकावट नही और नींद तो परदेस जाकर बच्चो के पास रहने लगी है, कितनी बार बच्चो ने अपने पास बुलाना चाहा

लेकिन न अपना घर छोड़ा गया न ही पुरानी यादें बस अब यही अकेलापन कभी अच्छा लगता था तो कभी काटने को दौड़ता था। 

ढलती साँझ जैसी भी हो गर इसमे तपने के बाद सुकून मिलता है तो तब तक चिंता भी बनी रहती है जब तक कि घर के सब सदस्य समय पर घर वापस न आ जाए…

आज बड़ी बहू बच्चो के साथ गर्मी की छुट्टियां मनाने घर आ रही थी कहने को जिस शहर मे बेटा-बहू रहते थे वहाँ भी आलीशन बंगला बनवा लिया था उन्होंने…

गाड़ी,नोकर-चाकर सभी थे बस कमी थी तो अम्माजी की… 

अम्माजी का व्यवहार सबके प्रति सीधा-सरल तो था लेकिन उनमें एक बीमारी भी थी शक करने की,फिर बहू की एक रिश्तेदार ने ये भी कह दिया था कि,

“ये लड़की आपकी बड़ी बहू तो बन गई है लेकिन देखना ये केवल अपने मायके वालों को ही करती रहेगी और पढ़ी लिखी तो बहुत है लेकिन अक्खड़ भी बहुत है

कुछ नही समझेगी आपको…”एक ये भी कारण था कि अम्माजी कुछ दिन को खामोशी के साथ बड़ी बहू के साथ रहने को तो तैयार थी

लेकिन ताउम्र नही, आख़िर उनका ख़ुद का भी कोई आत्म-सम्मान था अगर उनके कुछ कहने पर बड़ी बहू ने उनको पलटकर कुछ कह दिया तो क्या इज्ज़त रह जायेगी उनकी इसी कारण बड़ी बहू को लेकर एक ग़ुबार सा तो भरा ही था उनके दिल मे।

बच्चे और बहू अपने नियत समय पर घर पहुँच चुके थे सूने घर के L.E.D. की आवाज़ को आज अपनो के वार्तालाप ने तोड़ दिया था,

ये माहौल ही ख़ुशनुमा होता है जब अपनों के हाथ अपनों को समेटते है।एक दूसरे की खैरियत जान कर रात का खाना खाकर सब अपने अपने कमरो मे सोने चले गए।

अम्मा जी के आँचल मे आज उनकी प्यारी पोती स्नेहा के समा जाने से आज जाने कितने दिनों बाद उन्हें वात्सल्यपूर्ण नींद आयी थी।

सुबह बहू जल्दी जल्दी स्नान आदि के बाद बाई का इंतज़ार करने लगी और उसके आते ही सबके लिये नाश्ता बनवाने लगी फिर घर की सफ़ाई,दोपहर के खाने आदि मे अपनी हिदायतें देने लगी,

पुरानी बाई थी तो ज़्यादा समझाना तो वैसे भी नही पड़ता था हर बार बाई के मज़े ही हो जाते थे,बड़ी बहू यानी भाभी के आने से घर मे हँसी मज़ाक के साथ-साथ घर का हर कोना चहकने लगता था

और फिर वो वापस जाते जाते सबको उनके मन का जरुरत का सामान भी ख़रीदवा के जाती थी तो सबको ही गर्मियों की छुटियों का इंतज़ार रहता था।

लेकिन अम्माजी का शकी दिमाग़ इसमे भी यही सोचता था कि इस घर मे हिस्से के कारण ये बड़ी बहू आती है,

हां एक दो बार बहू ने अपने भतीजे को साथ रखने को कहा था लेकिन अम्माजी के कुछ न कहने पर उसने अपने भतीजे के रहने का इंतज़ाम उसी शहर के एक होस्टल मे करवा दिया था। 

आज बेटा भी आने वाला था क्योंकि बच्चो के स्कूल की गर्मियों की छुट्टियां खत्म होने वाली थी,बहू-बच्चो को ले जाने के बहाने ही सही व्यस्त बेटे का भी माँ से मिलना हो जाता था।

“अरे स्नेहा दादी से पूछना ज़रा आज बाज़ार चलेगी क्या वो?

जो भी जरूरी सामान खरीदना चाहती है ख़रीद लेंगे,दो बार उनके कमरे मे गई तो वो इयरफोन लगाए,सुकून से भजन सुन रही थी,

मैंने उन्हें डिस्टर्ब करना सही नही समझा,देख लो बेटा और नाश्ते के लिए भी पूछ लो यहाँ आकर खायेगी या उनके रूम मे ही लेकर आऊँ?”….

“ओ. के. मम्मी कहते हुए स्नेहा एकदम दादी के क़रीब जाकर उन्हें देखने लगी, जिसके कारण दादी एकदम सकपका गई और इयरफोन गिरकर कुर्सी मे फँस गए,दादी ने इयरफोन को खींचकर ठीक से टेबल पर रख दिया औऱ स्नेहा के साथ नाश्ते के लिए जाने लगी

तभी उनके कानों मे मोबाइल पर बात करती हुई उनकी बहू की आवाज़ पड़ी,”जी हम लोग दो दिन और है आप प्लीज़ अभी आकर दस्तावेजो पर अम्माजी के साईन ले लीजिए,ये भी आने वाले है,

हम सब अम्मा जी को साथ मे ही सरप्राइज देंगे”,कहते हुए बहू ने अम्मा जी को देखते ही फ़ोन काट दिया, तभी अम्माजी बहु के करीब जाकर चिल्लाई,

“बहू !जानती थी मैं तुम यही कुछ करोगी इस घर को बेचकर मुझे बेघर करके अपने साथ रखने का एहसान करोगी, तुम्हे शर्म नही आती,तुम्हारे माँ बाप के साथ कोई ऐसा करे तब???

अरे माँगना होता तो ऐसे ही साईन ले लेती मेरे   इसमें मुझे क्या सरप्राइज देना?”बहु ने कभी भी अम्माजी द्वारा शब्द-भेदी बाणों की  उम्मीद नही की थी

तो वो ये सब सुनकर सहम गई और उसकी आँखें अनायास ही छलकने लगी…

“अरे माँ!सुनो तो”तभी बेटा जो इतनी दूर से जल्दी जल्दी मां से मिलने के लिए आया था,थम गया ये सब सुनकर, लेकिन तभी अचानक मां के सोफे पर गिरने के कारण सब उनकी ओर दौड़ पड़े,जल्दी-जल्दी फॅमिली डॉ को बुलाया गया,

डॉ साहब ने कुछ दवाइयां लिखी साथ ही कहा,”घबराने की कोई बात नही, बस ये आराम करें”पूरा परिवार अम्माजी के पास ही बैठा रहा, बेचैनी के घंटे नई भोर मे परिवर्तित हो गए, दवाइयों के कारण अम्मा जी की सुखद नींद पूरी हुई,

उनके होश मे आते ही बहु जल्दी से चाय बनाने चली गई, फिर उसने स्नेहा को आवाज़ लगाई,”स्नेहा ये चाय-बिस्कुट दादी के लिए ले जाओ,बाई आ गई है मैं नाश्ता बनवा कर आती हूँ….

“अम्माजी अंदर ही अंदर बड़बड़ाते हुए बोली,

“पोल खुल गई तो अब आँखे नही मिला पा रही होगी,बड़ी आई सबके लिए नाश्ता बनवाने वाली”,

तभी उनकी नज़र बेटे पर पड़ी जो माँ के होश मे आने पर ख़ुशी से उनके पैर छूने को आगे बढ़ा,”ठीक है, ठीक है ख़ुश रहो”लेकिन मां की नाराजगी वो समझ नही सका,”माँ आता हूँ जब तक आप भजन सुनो,”इयरफोन पकड़वाते  और मोबाइल पर उनके पसंद के भजन लगाता हुआ,बच्चो को ये हिदायत देता हुआ कि दादी के पास ही रहना”,कहता हुआ कमरे से बाहर निकल गया…दादी भी इयरफोन लगाकर कुछ पल को मानसिक शांति चाहती थी,वैसे भी अगर वो ये इयरफोन न लगाएं तो इतने बड़े घर मे सबकी आवाजे गूँजती है

इसलिए इयरफोन लगाकर वो भजन सुनकर उसमे खो जाती थी।”तुम आई क्यो नही माँ के पास?कल से अब वो होश मे आयी है और अब सरप्राइज़ खत्म करो बता दो कि यही पास मे उनके नाम से वृद्धाआश्रम बनवाने के लिए ज़मीन ली है उसी के दस्तावेजो मे उनके साईन चाहिए,

आख़िर ये सपना उनके लिए तुम्हारे द्वारा  ही तो देखा हुआ है,

जिससे उनका नाम हमेशा के लिए अमर हो जाये और वो वहाँ जाकर सबसे मिलती-जुलती रहे जिससे उन्हें अकेलापन भी न लगे।”बहु जो जाने कब से ख़ामोश सी हो गई थी,

ख़ुद को संभालते हुए बोली,”रजिस्ट्री के कागज़ अलमारी मे ही रखे है आप ख़ुद अम्माजी को बता दो मुझे देखकर कही फिर से उनकी तबियत ख़राब न हो जाये!!!

“कहकर वो जो कल से अब तक सम्भली थी,आँसुओ मे बहती चली गई,बहुत मुश्किल से बेटा उसे संभाल पाया,प्यार से समझाते हुए बोला,

“क्या तुम भी अब अपनी तबियत ख़राब कर लोगी?”तभी बहु बोली,”अरे!कही अम्माजी हमारी बाते न सुन ले, बेकार ही परेशान हो जाएगी,”…

बेटा बोला,”नही सुन पाएगी, इयरफोन लगाए भजन सुन रही है”…

“फिर ठीक” बहु बोली इतने मे स्नेहा आयी और बोली,”मम्मी-पापा आपको दादी बुला रही है”दोनो एकदम कमरे की ओर दौड़े, “क्या हुआ मां?”दोनो ने एक साथ पूछा…मां शायद रो चुकी थी आंखे सूजी हुई लग रही थी, “कही दर्द हो रहा है क्या अम्माजी ?”बहु ने जैसे ही उनके हाथ पर अपना हाथ रखा, अम्माजी के सब्र का बाँध टूट पड़ा,”बड़ो को क्या करना होता है अपनी गलतियों का प्रायश्चित करने के लिए?”सिसकते हुए अम्माजी ने पूछा…फिर बोली अगर उस दिन मेरे इयरफोन कुर्सी मे फँसकर ख़राब न हुए होते तो मैं जाने कब तक गलतफहमी में ही सोती रहती?दूसरो के हिसाब से तुमको तौलती रही तुम्हारी भावनाओ के लिए कभी अपनी समझ के तराजूओ का प्रयोग ही नही किया”बहु बोली,”अम्माजी माँ-बेटी के बीच सौदेबाज़ी नही स्नेह-आशीर्वाद होता है, हमारे साथ अपने दूसरे घर मे चलकर रहिए, ये तो आपका घर है ही फिर आपके नाम से वृद्धाआश्रम भी बनवाने वाले है,जब मन चाहे तब यहाँ आ जाइयेगा….”ढल चुकी थी थकी साँझ और हो चुका था नव-प्रकाश जिसमे अब सिर्फ स्नेह ही स्नेह था ।

@हर दशा सकारात्मक रहे@            -मणि”सयंमी”

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