औरत एक रत – Snehal

मैं ग़लत साबित हुआ हूं
औरत को जानने में
वो मुझे कुछ नहीं मानती
ये हिसाब मानने में

एक ही मीट्टी एक ही तरीका
ईस्तमाल हुआ लगता है
एक जैसा ही होगा खयाल
जुदा जुदा फीतरत बनाने में

या चहेरा नज़रयार मिला
या दिल हमदर्द
खुदा रहा है नाकाम
दोनों एक जिस्म में समाने में

कोई आसमान की कली थी
कोई थी जमीन का चांद
मैं रहा खाली हाथ
कुदरत के बेशुमार खजाने में
©️स्नेहल पंडित

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *