कन्हैया, किसको कहेगा तू मईया

©शिखा श्रीवास्तव

आसमान पर छायी कालिमा छटने लगी थी।

हालांकि अभी सूर्योदय में वक्त था पर धीरे-धीरे उजाला अपना दामन फैलाने लगा था। 

वातावरण में गहन मौन पसरा हुआ था, जिसे बीच-बीच में चिड़ियों की चहचहाहट भंग कर रही थी, जैसे कोई नटखट बच्चा सितार के तारों से छेड़खानी कर रहा हो।

इस खुशनुमा माहौल के बीच में भी पार्क के एक बेंच पर उदासी पसरी हुई थी, जहां ‘शेखर जी’ बैठे थे अकेले, गुमसुम, मानों वो यहां होकर भी यहां नहीं थे।

“अरे शेखर बाबू, आज अकेले-अकेले, विवेक बेटा कहां है?” शेखर जी के मित्र अमित जी ने पूछा जो आज अचानक बहुत वर्षों के बाद अपने शहर लौटे थे।

अमित जी की आवाज़ से शेखर जी की तन्द्रा टूटी।

“अरे अमु तुम अचानक यहां कैसे?” आँसुओं को छुपाने की कोशिश में थक चुकी बोझिल नज़रों से अपने मित्र की तरफ देखकर शेखर जी बोले।

“कल रात ही लौटा हूँ। जानता था मेरा शेखू मुझे यहीं मिलेगा।

इसलिए इस उम्र में भी दौड़ता हुआ चला आया।” अमित जी ने जवाब दिया।

अमित और शेखर जी दोनों बचपन के मित्र थे, एक-दूसरे के राजदार, हमदर्द।

आज इतने वर्षों के बाद मिलने पर भी अपने शेखू की आँखों में छुपा दर्द अमु ने तुरंत पहचान लिया।

“क्या बात है शेखू? देख रहा हूँ की मेरा मित्र वैसा नहीं है जैसा मैं उसे छोड़कर गया था।

और तूने तो बताया था विवेक बेटा हमेशा तेरे साथ सैर पर आता है। कहाँ है वो? दिख नहीं रहा।” अमित ने शेखर के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।

पहले तो शेखर जी ने बात टालनी चाही, लेकिन अमित जी भी कहाँ आसानी से मानने वाले थे।

हारकर शेखर जी ने बताया कि उनका बेटा विवेक उनसे दूर होता जा रहा है, और वो उसके बिना खुद को बहुत अकेला महसूस करने लगे है।

बातें करते-करते शेखर जी बीते दिनों की यादों में खो गए।

जिस दिन उनके बेटे विवेक का जन्म हुआ था, उसी दिन उन्हें अपनी नौकरी में प्रोमोशन मिला था। अब वो अपने ब्रांच के हेड बन चुके थे।

उनकी मार्केटिंग स्किल की उनके सर्किल में धाक थी, जिसकी बदौलत उनकी कंपनी को बहुत फायदा हुआ था।

अभी शेखर जी अपनी पत्नी रेवा और बेटे के साथ ढंग से इस खुशी का जश्न भी नहीं मना सके थे कि दुखों ने उनके दरवाजे पर दस्तक देनी शुरू कर दी।

तीन दिन बाद उनका बेटा एक महीने का होने वाला था।

वो सोच रहे थे इसी खास मौके पर क्यों ना प्रोमोशन और विवेक के जन्म की दावत सभी परिचितों को दे दी जाए की तभी फोन की घंटी बजी।

उधर से घबराई आवाज़ में उनकी माँ ने कहा “बेटा, जल्दी से अस्पताल पहुँच।

रेवा बाथरूम में गिर गयी थी। उसे बहुत चोट आई है।”

बौखलाई सी, बदहवास हालत में जब शेखर जी अस्पताल पहुँचे, रेवा इस दुनिया से जा चुकी थी।

शेखर जी का मन हुआ जोर-जोर से चीखकर रोये लेकिन अपने नन्हे से बच्चे का चेहरा देखकर उन्होंने अपने आँसुओं को पी लिया।

नन्हे विवेक की सारी जिम्मेदारी अब उनके ऊपर थी।

रेवा की तेरहवीं तक उन्होंने दफ्तर से पूरी तरह छुट्टी ले ली थी।

आखिरकार अंतिम विधि भी पूरी हुई।

अब शेखर जी को विवेक की चिंता सताने लगी। उनके दफ्तर जाने के बाद उनकी बूढ़ी माँ अकेले इतने छोटे बच्चे को संभाल नहीं सकती थी और ना ही उनमें इतनी ताकत थी कि वो सारा दिन आया के पीछे-पीछे रहकर निगरानी कर सके।

और आया पर अंधा भरोसा करके उसे अपने बच्चे को सौंपने की गलती वो कभी नहीं कर सकते थे।

अब यही तो एक निशानी रह गयी थी रेवा की जिसे शेखर जी अपनी जान से भी ज्यादा चाहते थे।

नाते-रिश्तेदारों ने दूसरी शादी का सुझाव दिया लेकिन शेखर जी ने साफ शब्दों में मना कर दिया।

वो सोच में डूबे ही थे कि नन्हे विवेक के रुदन से उनकी तन्द्रा टूटी।

उसके लिए दूध बनाते हुए शेखर जी तय कर चुके थे कि अब उन्हें क्या करना है।

उन्होंने अगले दिन ही अपना इस्तीफा अपने दफ्तर भिजवा दिया। और जो बचत थी उससे अपने दोमंजिला मकान के निचले हिस्से में किताब-कॉपियों की एक छोटी सी दुकान खोल ली। नन्हे विवेक की देखभाल के साथ-साथ वो उस दुकान से इतनी आमदनी कर लेते थे कि अपने बेटे के लिए देखे गए रेवा के सपनों को, उसकी ख्वाहिशों को पूरा कर सके। अपने लिए ना अब उनकी कोई खास जरूरत बची थी, ना कोई इच्छा।

वक्त पंख लगाकर बीतता गया। अब विवेक विद्यालय जाने लगा था।

सुबह उसे तैयार करने से लेकर, उसके लिए नास्ता औऱ टिफिन बनाने का काम शेखर जी खुद करते थे।

उन्हें मंजूर नहीं था कि उनका बेटा रसोइए का बनाया  खाना खाए।

उसे विद्यालय पहुँचाकर वो दुकान पर बैठते।

फिर विद्यालय की छुट्टी होने के थोड़ी देर पहले घर जाकर जल्दी-जल्दी विवेक के लिए खाना बनाकर फिर उसे विद्यालय से लेने जाते।

विवेक को अपने हाथों से खिलाते हुए उन्हें यूँ महसूस होता था मानों उनका भी पेट भर गया हो।

एक अलग ही लगाव था दोनों पापा-बेटे के बीच। सब लोग शेखर जी से कहते की आप दोनों पिता-पुत्र की जोड़ी तो नम्बर एक है। ये सुनकर शेखर जी बस मुस्कुरा देते और विवेक को सीने से लगा लेते।

अब विवेक कॉलेज में आ चुका था। दुनिया की चकाचौंध का अब उस पर भी असर होने लगा था। जब उसके साथ के लोग अपने-अपने पापा के बारे में बताते की मेरे पापा अफसर है, मेरे पापा डॉक्टर है, मेरे पापा इंजीनियर है तब विवेक को ये बताने में शर्म आने लगी कि उसके पापा महज एक छोटी सी दुकान के मालिक है।

इस सबका असर विवेक और शेखर जी के रिश्ते पर भी पड़ने लगा। अब विवेक पहले की तरह ना शेखर जी के साथ बैठता था, ना साथ खाने में कोई रुचि दिखाता था।

शेखर जी को लगा शायद पढ़ाई और प्रतियोगिता के दवाब से विवेक बहुत परेशान है। कुछ दिन में ठीक हो जाएगा। लेकिन जब ये दूरी और बढ़ने लगी तब एक दिन शेखर जी ने विवेक से पूछ ही लिया “बात क्या है बेटे? तुम ना वक्त से घर आते हो, ना मेरे साथ बैठते हो, रात का खाना भी अब मुझे अकेले ही खाना पड़ता है। कोई परेशानी है तो बताओ अपने पापा को।”

“आप अब मेरा इंतज़ार करना छोड़ दीजिए पापा। फिलहाल मेरे पास बिल्कुल वक्त नहीं है। मुझे जीवन में बहुत कुछ करना है, बहुत बड़ा आदमी बनना है, ताकि मेरी तरह मेरे बच्चे को ये बोलते हुए शर्मिंदगी ना महसूस हो कि उसके पापा बस एक छोटी सी दुकान चलाते है।” विवेक ने सीधे-सपाट स्वर में कहा।

विवेक की ये बातें शेखर जी के सीने में नश्तर की तरह चुभी। उन्हें अपनी कामयाबी के दिन याद आने लगे लेकिन उनके मन में कोई पछतावा नहीं था। उन्होंने जो किया था वो जबरदस्ती में किया हुआ त्याग नहीं, उनका प्यार था रेवा के लिए और उसकी अंतिम निशानी के लिए।

उस दिन से शेखर जी ने खुद को अपने-आप में समेट लिया। बस रोज रात विवेक के सो जाने के बाद चुपके से उसे एक नज़र देख लेते थे और खुद को तसल्ली देते थे कि सब पहले जैसा हो जाएगा।

अब विवेक का एमबीए पूरा हो चुका था। वो अपना खुद का होटल बिज़नेस शुरू करना चाहता था। पूंजी के इंतजाम के लिए जब उसने शेखर जी से बात की तो उन्होंने तत्काल अपने गांव की थोड़ी सी जो ज़मीन थी उसके कागज विवेक को सौंप दिए।

उस जमीन की बदौलत विवेक को इतना लोन मिल गया कि उसने अपना एक छोटा सा रेस्टोरेंट खोल लिया। धीरे-धीरे अपनी मेहनत और लगन से विवेक तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ता गया। अब उसके चार रेस्टोरेंट थे, और इसके बाद वो एक शानदार रेसिडेंशियल होटल खोलने की योजना बनाने में लग गया था।

लेकिन इस रास्ते पर आगे बढ़ते हुए वो अपने पापा को, उनके प्यार को बहुत पीछे छोड़ आया था। अपने काम में उसने खुद को इतना व्यस्त कर लिया था कि अक्सर कई-कई दिन घर नहीं जाता था। शेखर जी उसे फोन करते तो “बाद में बात करता हूँ” बोलकर फोन रख देता और फिर दोबारा फोन करना उसे याद ही नहीं रहता था।

सुबह-सुबह टहलने जाना हमेशा ही शेखर जी की दिनचर्या का हिस्सा रहा था। विवेक भी हमेशा उनके साथ जाता था। टहलते हुए दोनों दुनिया भर की बातें करते थे। लेकिन पिछले एक साल में सब कुछ बदल गया था। शेखर जी अब भी टहलने जाते थे लेकिन अकेले। उनके पास बातें तो थी, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं था। विवेक के अलावा बस एक अमित था उनका दोस्त जो कि बहुत सालों से विदेश जाकर रह रहा था। भला फोन पर कितनी बातें हो पाती।

एक दिन पुराने अल्बम्स के पन्ने पलटते हुए शेखर जी को जन्माष्टमी की कुछ तस्वीरें मिली। रेवा बहुत धूम-धाम से ये त्योहार मनाया करती थी। मंदिर की सजावट, बाल-गोपाल का झूला, उनका श्रृंगार करने से लेकर मिठाईयां बनाना, सब कुछ वो खुद अपने हाथों से किया करती थी।

उसकी इच्छा थी कि जब उनका बेटा होगा तब वो उसे कान्हा की तरह सजाये। और उसकी ये इच्छा शेखर जी ने पूरी भी की।

कान्हा के रूप में नन्हे से विवेक की तस्वीर देखकर अरसे बाद शेखर जी के चेहरे पर मुस्कान आयी।

कुछ ही दिनों में जन्माष्टमी आने वाली थी।

मन ही मन खुद से बातें करते हुए शेखर जी सोच रहे थे “विवेक आता है तो उससे बात करूंगा कि क्यों ना फिर पहले की तरह जन्माष्टमी मनायी जाए। जब से वो बड़ी कक्षा में गया तब से पढ़ाई की व्यस्तता में ऐसी धूम हम मचा ही नहीं सके।”

विवेक के घर आते ही शेखर जी उत्साह से बोले “बेटे, कल तुम थोड़ी देर के लिए छुट्टी ले लो। जन्माष्टमी आने वाली है। बाजार चलेंगे खरीददारी करने। इस बरस फिर से पहले की तरह धूमधाम से त्योहार मनाएंगे।”

“ओह्ह पापा, मेरे पास इन फालतू कामों के लिए वक्त नहीं है। आपको जो करना है कीजिये। इतने तो नौकर है अब घर में, किसी के साथ चले जाइये, मैं गाड़ी भेज दूंगा। और जाने की भी क्या जरूरत है। अब तो हर चीज ऑनलाइन मिल जाती है। घर बैठे ही मंगवा लीजिए।” कहता हुआ विवेक अपने कमरे में चला गया।

शेखर जी का मन टूट गया विवेक की बातों से। उन्होंने कहना चाहा “बेटे की जगह क्या नौकर ले सकते है?” पर बिना कुछ कहे अपने कमरे में आ गए और सोने की नाकाम कोशिश करने लगे।

अगली सुबह पार्क में उदास बैठे हुए अचानक उनका पुराना दोस्त अमित वापस आ गया और अब तक रोके हुए आँसुओं का बांध उसके सीने से लगते ही टूट गया।

“दोस्त, अब लगता है कि शायद मैंने गलती कर दी, अगर मैंने अपनी नौकरी ना छोड़ी होती तो आज मैं भी बहुत कामयाब होता, तब मेरे बेटे को मुझ पर शर्म नहीं आती।” शेखर जी ने खुद को संभालते हुए कहा।

अमित ने अपने दोस्त के आँसुओं को पोंछते हुए कहा “लेकिन क्या तब तेरा बेटा वो बन पाता, जो वो आज है? उसका भविष्य संवारने में तूने अपने सपने जला दिये, अगर तूने माँ बनकर उसे ना संभाला होता तो उसे अच्छी परवरिश कभी नहीं मिल पाती। तुझ जैसा पिता ना जाने कितने जन्मों के पुण्य से मिलता है।”

उधर घर पर नौकर ने शेखर जी का चश्मा विवेक को देते हुए कहा “साहब जी, बड़े साहब आज अपना चश्मा छोड़कर चले गए है।”

“ओफ्फ हो ये पापा भी ना, कितने लापरवाह हो गए है। अब सड़क पर कहीं चोट-वोट लग गयी तो नयी मुसीबत आ जायेगी। इससे तो अच्छा मैं ही चश्मा देकर आ जाता हूँ।” मन ही मन बड़बड़ाते हुए विवेक पार्क के लिए निकल पड़ा।

पार्क पहुँचकर जब वो शेखर जी के बेंच के पास पहुँचा तब शेखर जी अमित जी के साथ अपने बीते जीवन को साझा कर रहे थे।

उनकी बातों में अपना नाम सुनकर विवेक ठिठक गया और चुपचाप उनकी बातें सुनने लगा।

अपने पापा की और अमित जी की बातें सुनकर आज उसे अपनी सारी गलतियां याद आ रही थी। जिस पिता पर वो शर्मिंदा हो रहा था, वो तो इतने महान थे कि उनके प्रेम का कर्ज वो कभी नहीं चुका सकता था।

ये सब सोचते हुए विवेक की आँखों से पछतावे के आँसू बहने लगे। 

लेकिन उस वक्त उसने किसी तरह अपने आँसुओं को पोंछ लिया और शेखर जी के पास जाकर बोला “पापा, आप चश्मा भूल गए थे।”

कहीं ना कहीं अब भी उनका बेटा उनकी परवाह करता है, ये सोचकर शेखर जी मुस्कुरा उठे।

शेखर जी ने उसका परिचय अमित जी से करवाया। अमित जी के पैर छूते हुए विवेक बोला “कभी फुर्सत में घर आइए चाचाजी। अभी तो मुझे पापा को घर लेकर जाना होगा। नास्ते के बाद उनकी दवा का वक्त हो चला है।”

शेखर और अमित जी दोनों ही विवेक की इस बात पर हैरान हो गए। अमित को घर आने के लिए बोलकर शेखर जी विवेक के साथ चल पड़े। लेकिन आज दोनों पापा-बेटे के बीच खामोशी पसरी हुयी थी।

नास्ते के बाद शेखर को वक्त पर सारी दवा लेने और आराम करने की हिदायत देकर विवेक दफ्तर चला गया।

वहां पहुँचकर उसने अपने मैनेजर को बुलाया और कहा “हमारे सारे रेस्टोरेंट में सूचना भिजवा दीजिये की अब से ना किसी को ओवरटाइम करने की जरूरत है और ना ही वक्त से पहले आने की। नौकरी के अलावा अपने परिवार और अपनों को वक्त देना भी जरूरी है।”

जैसे ही ये सूचना सारे रेस्टोरेंट के कर्मचारियों के पास पहुँची, सभी खुशी से झूम उठे। ओवरटाइम कर-करके सभी त्रस्त आ चुके थे, लेकिन मुश्किल से मिली नौकरी के कारण कोई कुछ कहता नहीं था। सबने विवेक को मन ही मन दुआएं दी और प्रार्थना की कि ये परिवर्तन क्षणिक ना हो।

शाम होते ही विवेक घर पहुँच गया। शेखर जी उस वक्त अपनी दुकान में बैठे थे।

“अरे पापा, आप तो हमेशा छः बजे दुकान बंद कर देते थे ना।” विवेक ने हैरानी से कहा।

शेखर जी बोले “अब अकेले कहीं मन नहीं लगता बेटे, इसलिए यहीं बैठा रहता हूँ। सड़क पर आते-जाते लोग, और कभी-कभी आने वाले ग्राहकों से थोड़ा जी बहल जाता है।”

“,अब आपको मन बहलाने के लिए यहां बैठने की जरूरत नहीं है पापा। आज से दुकान फिर छः बजे ही बंद होगी। अपने सभी ग्राहकों को बता दीजिएगा। और अब चलिये मेरे साथ।” विवेक शेखर जी का हाथ पकड़कर उन्हें उठाता हुआ बोला।

“अच्छा-अच्छा चलो, पर जाना कहाँ है?” शेखर जी हैरानी से बोले।

विवेक ने दुकान बंद करते हुए कहा “जन्माष्टमी की खरीददारी करने और कहां।”

लंबे अरसे के बाद आज शेखर जी को पहले की तरह विवेक का साथ मिला था। साथ मिलकर खरीददारी करते हुए उनके बुझे हुए चेहरे पर फिर से रौनक लौट आयी थी।

घर पहुँचकर विवेक ने शेखर जी से कहा “आप आराम कीजिये पापा मैं थोड़ी देर में आता हूँ।”

रसोई में पहुँचकर विवेक ने रसोइए से कहा “तुम रहने दो आज। आज तुम्हारी छुट्टी।”

विवेक ने शेखर जी की पसंद का खाना आज अपने हाथों से बनाया।

खाना खाते हुए शेखर जी बोले “अरे आज तो खाने का स्वाद ही दूसरा है। बिल्कुल वैसा जैसा तुम्हारी माँ बनाया करती थी।”

“आज से आपको हर रात ऐसा ही स्वाद मिलेगा पापा, क्योंकि ये खाना अपनी माँ के इस बेटे ने बनाया है।” विवेक ने कहा।

ये सुनकर शेखर जी चौंक गए और बोले “नहीं-नहीं बेटे, तुम्हें बेकार में परेशान होने की जरूरत नहीं है मेरे लिए। वैसे ही तुम इतने व्यस्त रहते हो।”

“मैं व्यस्त रहता था पापा, अब नहीं रहूंगा। अब काम के साथ-साथ पहले की तरह मुझे अपने पापा के साथ भी वक्त बिताना है। मुझे मेरी गलती का अहसास हो गया है पापा। अपने इस नालायक बेटे को माफ कर दीजिये पापा। पता नहीं किस गुरुर में मैंने आपकी इतनी बेइज्जती की।

हाँ आप सचमुच मेरे दोस्तों के पापा से अलग है, आप उनकी बराबरी नहीं कर सकते, क्योंकि वो सब सिर्फ पापा है, लेकिन आप तो अपने विवेक की माँ भी है।” ये कहते हुए विवेक शेखर जी के गले लगकर रो पड़ा।

विवेक को चुप कराते हुए शेखर जी बोले “मत रो बेटे, वरना तेरी माँ सपने में आकर मुझे डाँटेगी की मैं उसके लल्ला को क्यों रुला रहा हूँ।”

ये सुनकर विवेक हँस पड़ा। उसके साथ शेखर जी की भी सम्मिलित हँसी से घर गूंज उठा।

जन्माष्टमी का दिन आ चुका था। शाम को घर लौटने के बाद विवेक ने शेखर जी के साथ मिलकर पूजाघर की सजावट की, बाल-गोपाल का झूला, उनका श्रृंगार सब कुछ करने के बाद दोनों पूजा के लिए रात के बारह बजने का इंतज़ार करने लगे। इंतज़ार करते हुए शेखर जी की आँख लग गयी थी। जैसे ही बारह बजे विवेक ने मंदिर की घंटी बजा दी।

घंटी की आवाज़ से जब शेखर जी की आँख खुली तो उन्होंने देखा विवेक ने कान्हा जी के जैसी पोशाक पहनी हुई थी। बचपन में जैसा मोर-मुकुट शेखर जी उसके लिए लाए थे आज भी विवेक ने वैसा ही मुकुट पहना था।

“कैसा लगा सरप्राइज पापा? मुझे पता है मम्मा की इच्छा थी मुझे कान्हा के रूप में देखने की और आपको भी बहुत अच्छा लगता था मुझे कान्हा बनाना।” विवेक ने कहा।

विवेक के सर पर हाथ रखते हुए शेखर जी बोले “भला अपने नटखट कान्हा का सरप्राइज कैसा लगा, ये भी अब बोलकर बताना पड़ेगा क्या?”

अपने कान्हा के साथ कान्हा जी की आरती करते हुए शेखर जी के चेहरे पर बिल्कुल माँ यशोदा के जैसी खुशी औऱ ममत्व की आभा बिखर गयी थी।

©शिखा श्रीवास्तव


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