कहानी – ब्लड कैंसर

ये एक सच्ची कहानी है। ये कहानी थोड़ी अलग है मेरा नाम है भरत यादव है और मै लखनऊ का रहनेवाला हूँ। मेरी शादी को अभी एक साल ही हुआ है। शुरुआत में सब अच्छा था जैसा की सबके साथ होता ही है लेकिन बाद में परिस्थियो में बदलाव आ गया और मेरे गृहस्थ जीवन में कई कठिनाइया आना शुरू हो गई। मेरी बीवी का नाम सुमित्रा है देखने में काफी खूबसूरत और व्यवहार में किसी आर्दश पत्नी की तरह है। मेरे माता पिता हमारे साथ नहीं रहते है। उन्होंने हमारे पुस्तैनी घर जो की कानपुर में था वंही रहना पसंद किया और हम आ गए लखनऊ रहने के लिए।

मेरी बीवी के साथ मेरे रिश्ते कब से ख़राब होने लगे शायद इस बात को याद करना तो थोड़ा मुश्किल है लेकिन इन ख़राब रिश्तो के कई कारण थे जिसमे मै मानता हूँ की कुछ गलतिया मेरी भी  और कुछ मेरी  बीवी सुमित्रा की भी। लेकिन हम बस फिर भी एक साथ रह रहे थे ना ही अब हम एक दूसरे से प्यार की उम्मीद रख रहे थे और ना ही बात करना चाहते थे। जैसा की मेने पहले ही बताया की मेरी पत्नी पहले ऐसी नहीं थी हम साथ में घूमने जाते थे उससे बाहर आइसक्रीम खाना बेहद पसंद था और उसे खाते हुए मुझे देखना। जब भी वह काली साड़ी पहनती थी तब मै हलके से उसके कमर पर चोटी काट लेता था। और उसके भींगे बालो को अक्सर तोलिये से आजाद करके गले लगा लेता था।  ये ही कुछ खट्टी मीठी यादे थी जिन्हे मै अक्सर याद करता हूँ लेकिन शायद ये यादे भी मेरे दिमाग से गायब हो चुकी है। रिश्ते इतने ख़राब हो चुके है की अब लगता है जैसे हम दोनों एक घुटन में जी रहे हो। हमने 4 या महीनो से एक दूसरे से बात  भी नहीं की थी। नौबत यंहा तक आ चुकी है की अब हम तलाक लेने वाले है। लेकिन एक दिन ऐसा हुआ जिससे मेरी जिंदगी ही बदल गई। ये बात है उस  दिन की जब मै ऑफिस से लेट घर पहुंचा था वैसे तो अक्सर में लेट ही आता था और मेरी पत्नी सुमित्रा खाना फ्रिज में रखकर सो जाती थी।

आज मै काफी थक गया था इसलिए जब मैने दरवाजा खोला तो सामने सुमित्रा ही खड़ी थी।

तुम सोये नहीं? भरत ने एक अजीब नजरो से सुमित्रा को देखते हुए पूछा।

नहीं! मै खाना गर्म कर देती हूँ आप जब तक मुंह हाँथ दो लीजिये! सुमित्रा इतना कहकर रसोईघर में चली जाती है।

इतने दिनों बाद सुमित्रा ने मुझसे बात की थी लेकिन मेरे लिए  ख़ुशी से ज्यादा अजीब आश्चर्य को पैदा कर रहा था। इसलिए मै जाकर सीधा बाथरूम में चला गया और मुंह धोने लगा मुझे मेरी तबियत ख़राब लग रही थी मानो उलटी होने वाली हो। इसलिए मै अपना सिर पकड़ कर बैठ गया अचानक ही मुझे उलटी हो गई और उसमे हल्का खून भी था। खून देखकर मेरे पैरो तले जमीन ही खिसक गई।

ये क्या है? भरत ने अपने आप से सवाल किया।

खाना गर्म हो गया है! बाहर सुमित्रा की आवाज आती है।

भरत सुमित्रा की आवाज सुनकर तुरंत ही अपने आप को साफ़ करता है और जल्दी से मुंह हाँथ धो कर बाहर आ जाता है। भरत चुपचाप जाकर खाने की मेज पर बैठ जाता है। दोनों तरफ ही एक अजीब चुप्पी थी भरत को समझ नहीं आ रहा था की वह पत्नी सुमित्रा को कैसे उसकी इस दशा को बयाँ करे इसलिए वह चुपचाप बस खाना खाता है। सुमित्रा बस भरत को देखती रहती है। एक औरत की मनोव्यथा शायद  कोई समझ सके। एक महिला क्या चाहती है की वह अपने पति के साथ कुछ समय बिताये अपने दिनचर्या की बाते उससे साझा करे। ये छोटी छोटी बातो से खुश होने वाली मनोव्यथा के बाद भी पुरुष अपने कामो में इन चीज़ो को भूल जाता है। भरत उठकर अपने कमरे में चला जाता है और सुमित्रा उसे जाते हुए देखती रहती है मानो वह चाहती हो की हमे बात करनी चाहिए लेकिन उसकी ख़ामोशी में वह चुप ही  रहती है।

अगले दिन उठते ही भरत ऑफिस जाने की बजाय डॉक्टर से मिलने एक क्लिनिक चला जाता है और अपनी खून की जाँच करवाता है जिससे वह समझ सके की आखिर उसे हुआ क्या है।

ठीक है भरत आप कल अपनी मेडिकल रिपोर्ट ले  जाइएगा! इतना कहकर डॉक्टर चला जाता है।

भरत अपनी कार में बैठा सोचता रहता है की आखिर उसे कौनसी बीमारी है। वह ना ही ज्यादा शराब पीता था और ना ही उसे किसी अन्य गंदी आदते थी। वह बस एक समान्य जीवन यापन करने वाला व्यक्ति था। ऑफिस आकर भी भरत की बेचैनी कम नहीं हो रही थी। इसलिए वह अपने आप को किसी ना किसी काम में व्यस्त रख रहा था। रात को वह घर आकर अपने कमरे में जाने लगता है जंहा उसे एक टेबल पर कागजात दिखाई पड़ता है वह उसे उठा लेता है और अपने कमरे मे जाकर पढ़ने लगता है वह तलाक के कागज थे। वह जल्दी से कागजो को पलटता है तो उसके सिर चकरा जाता है ये देखकर की उसकी पत्नी ने तलाक के कागजो पर हस्ताक्षर कर दिए थे। शायद अब वह इस घुटन के साथ और नहीं जी सकती थी। भरत ये देखकर बिलकुल टूट चूका था। वो अहसास उसे खाये जा रहा था। उसका सिर दर्द करने लगा था इसलिए वह उन कागजो को रखकर सो जाता है। सुमित्रा अक्सर दूसरे कमरे में सोती थी। भरत को भी याद नहीं है की ये सब कब से शुरू हुआ लेकिन उसको इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी शायद यही दूरियों का कारण था।

अगले दिन सुबह उठ कर भरत पहले क्लिनिक जाता है और डॉक्टर से मिलता है।

डॉक्टर मेरी रिपोर्ट? भरत एक उत्साही रूप में पूछता है।

जी आपकी रिपोर्ट मेरे टेबल पर ही रखी है कृपया आप वंहा से उठा ले मुझे एक एमर्जेन्सी केस से मुझे जाना पड़ेगा! डॉक्टर इतना कहकर चला जाता है।

भरत भी जल्दी से टेबल पर रखी रिपोर्ट उठा लेता है और अपनी कार में बैठकर देखता है तो उसे ब्लड कैंसर होने का प्रमाण दिखाई देता है। भरत एक जोरदार धक्का लगता है मानो किसी ने उसकी जान निकाल ली हो। भरत की आँखों में मानो अँधेरा छाने लगा हो। जैसे तैसे भरत अपने आप को संभालता है और एक पार्क के बाहर अपनी गाड़ी खड़ी करके पार्क की बेंच पर बैठ जाता है और अपनी पत्नी सुमित्रा के बारे में सोचता है उसने कितना गलत किया है उससे महसूस हो रहा था। क्या एक अच्छी पत्नी की किस्मत में यही लिखा था कैसे वो अपनी किस्मत पर रोती होगी। जिंदगी भर पैसे कमाने में लगा दी और जो पास में था उसकी कदर नहीं की। भरत को वो सब याद आ रहा था की वह कैसे अक्सर अपनी पत्नी के लिए रात रात को आइसक्रीम की दुकाने खुलवा कर आइसक्रीम खिलाता था। लेकिन वो दिन कँहा एक यादो की धुंए में बदल गए, खुद भरत को भी पता नहीं चला। 

भरत ऐसे ही पार्क की उस बैंच पर बैठा सोचता रहता है और कब रात के 11 बज गए उसे खुद को भी पता नहीं चलता। वह एक टूटे हुए कांच की तरह बिखर गया था मानो कोई सिपाही युद्ध में हार गया हो। वह इस सच के साथ की उसे ब्लड कैंसर है वापस घर आ जाता है। घर में सुमित्रा पहले ही अपने कमरे में सो गई थी। खाना हमेशा की तरह गर्म किया हुआ था। भरत लेकिन खाना नहीं खाता और अपनी टेबल की दराज में अपनी मेडिकल रिपोर्ट को छुपा देता है और अपने बिस्टेर पर बैठकर सोचता है की उसके पास अब ज्यादा समय नहीं है। हो ना हो वह मुश्किल से एक महीना ही जी पायेगा इस छोटी सी अवधि में वो अपनी गलतियों को कैसे सुधारे? यही सोचता हुआ वह अपनी पत्नी के कमरे में जाता है जो की सो रही थी।

भरत हलके से उसके पास बैठ जाता है और सुमित्रा के माथे को चुम लेता है। सुमित्रा एक गहरी नींद में थी। इसलिए भरत उसके हांथो को  पकडे हुए रात भर ऐसे ही बैठा रहता है।

सुबह होते ही सुमित्रा अपने बिस्तर से उठती है और देखती है की भरत उसके लिए एक प्लेट में चाय और परांठे बना कर लाया है।

उठ गई मोहतरमा! भरत ने मुस्कराते हुए बिस्तर पर चाय रख दी।

अरे आप क्यों ले आये मै बना देती! सुमित्रा ने उठते हुए कहा।

अरे क्या हो गया। तुम तो ऐसे बन रही हो जैसे मैने चाय कभी नहीं बनाई तुम्हारे लिए और आप शायद भूल रही है की आपको मेरे हाँथ की चाय काफी पसंद थी! भरत ने हँसते हुए जबाब दिया।

सुमित्रा एक अजीब नजरो से चाय का कप लेकर चाय पीने लगती है।

सुमित्रा तैयार हो जाओ आज हम बाहर घूमने जा रहे है। बहुत दिन हो गए है हम कंही घूमने नहीं गए! भरत इतना कहकर कमरे से बाहर चला जाता है।

सुमित्रा नहा कर जब बाहर आती है तब भरत कमरे में अपनी नई शर्ट पहन रहा था। भरत को सुमित्रा अजीब नजरो से देख रही थी मानो वह पहचान रही हो  की ये क्या मे उनके पति भरत ही है।

अरे वो काली वाली साड़ी पहनना तुम पर काफी अच्छी लगती है! भरत ने मुस्कराते हुए कहा।

सुमित्रा अलमारी से काली साड़ी निकाल कर पहन लेती है जैसे ही वह शीशे के सामने खड़े होकर अपने आप को देखने की कोशिश करती है तभी भरत हलके से सुमित्रा के कमर पर चोटी काट लेता है जिससे सुमित्रा एकदम से चौंकते हुए भरत के ऊपर गिरती है। भरत हलके से बालो को तौलिए से आजाद कर देता है हलके भींगे बाल खुलते हुए भरत के चेहरे पर गिरते है। सुमित्रा की सांसे तेज़ हो जाती है और वो शर्माते हुए उठ खड़ी होती है।

मै बाहर गाड़ी में तुम्हारा इंतज़ार करता हूँ! भरत सकपकाते हुए उठ बैठता है और इतना कहकर जल्दी से बाहर चला जाता है।

थोड़ी देर बाद ही दोनों एक शॉपिंग मॉल जाते है और भरत सुमित्रा को कुछ नई साडिया खरीदने को कहता है। सुमित्रा एक आर्दश पत्नी थी तो क्या भरत का फर्ज नहीं बनता की वह भी एक आर्दश पति के रूप में अपने आप को पेश करे। भरत चुपके से एक मॉल के अंदर गहनों  की दुकान से एक सोने की पायल खरीद लेता है और अपनी जेब में छुपा लेता है तभी सुमित्रा भरत को ढूंढते हुए आती है।

लाइए इतनी साडिया आप कैसे उठाएगी! इतना कहकर सुमित्रा के हांथो से सामान भरत ले लेता है।

दोनों गाड़ी में सामान रखवा देते है।

वैसे यंहा पास में  झूलो वाला पार्क है। गाड़ी यही रहने देते है और उस पार्क में चलते है।

हाहाहा अब आप इस उम्र में झूला झूलेंगे? सुमित्रा हँसते हुए पूछती है।

मेरी धर्म पत्नी जी ग़ालिब का एक मशहूर शेर है की

“बाल रंगने से फक्त,

कुछ नहीं होता ग़ालिब

जवानी के लिए जिंदगी में,

कुछ नादानियाँ भी करने पड़ती है”

अच्छा जी! इतना कहकर सुमित्रा हॅसने लगती है।

दोनों पार्क में  चले जाते है और सुमित्रा को झूले पर बिठा कर भरत उसे झूला झुलाता है। सुमित्रा हलके से अपनी आंखे बंद कर लेती है और ठंडी ठंडी हवाओं को अपने चेहरे पर स्पर्श करने लगती है उसके बाल हवा में उड़ रहे थे और बालो के झालोखो से कान के झुमके चमक रहे थे। उसके बाद दोनों पार्क के पास एक चाय के नुक्क्ड़ पर बैठ कर चाय पीते है। सुमित्रा अपने बचपन की बाते भरत के साथ साझा करती है और भरत भी पुरे गौर देकर सुनता है और बीच में छोटे छोटे सवाल कर देता है। चाय के बाद दोनों एक खाने के होटल में जाते है और कोने वाली सीट और बैठकर खाना खाते है। अब रात के 9 बज चुके थे और सुमित्रा और भरत ऐसे ही सड़को पर टहलते हुए अपनी गाड़ी के पास आ रहे थे तभी हलके से भरत सुमित्रा के हाँथ थाम लेता है और सुमित्रा भी एक मुस्कराहट के साथ चलते हुए अपना सिर भरत के कंधे पर रख लेती है।

तभी भरत को एक आइसक्रीम वाली दुकान दिखाई देती है जो की बंद हो रही थी तभी भागकर भरत उस दुकान वाले को दुकान बंद करने से रोकता है और आइसक्रीम के आग्रह करता है लेकिन दुकानदार पहले ही दुकान बंद कर चूका था इसलिए वह कल आने को कहता है लेकिन भरत अजीब मजाकिया नाटकीय ढंग से उसे दुबारा खोलने को कहता है जिसे देखकर सुमित्रा हॅसने लगती है। फिर भरत दुकानदार के कान में कहता है और दुकानदार अपनी दुकान दुबारा खोलकर दो आइसक्रीम निकाल देता है। भरत तुरंत ही आइसक्रीम लेकर भागते हुए सुमित्रा के पास  है और दोनों आइसक्रीम कहते हुए कार तक जाने लगते है तभी सुमित्रा अजीब नजरो से मुस्कराती हुई भरत की तरफ  देखती है।

मुझे पता है की तुम्हे ये पूछना है की मेने दुकानदार के कान में ऐसा क्या कहा जिससे उसने दुकान खोल दी सही कहा ना? भरत ने आइसक्रीम खाते हुए कहा।

सुमित्रा एकदम से  चौंक जाती है की भरत को उसके मन की कैसे पता चली लेकिन वह बस चुपचाप हाँ में सिर हिला देती है।

खैर वह अपनी दुकान इसलिये जल्दी बन्द करके घर जा रहा था क्योंकि उसकी पत्नी गर्भावस्था में है और मैने भी उसके कान में यही कहा कि मेरी पत्नी यानी की आप गर्भावस्था में है और आपको आइस क्रीम खानी है फिर ये सुनकर वह पिघल गया और आइस क्रीम निकाल कर दे दी! भरत ने हँसते हुए पूरी बात बताई।

ये सुनकर पहले तो सुमित्रा हल्का सा शरमा जाती है फिर खिलखिलाकर हंसती है। दोनों ही बाते करते हुए कार के पास पहुंच जाते है। सुमित्रा जैसे ही कार में बैठने जाती है भरत उसे रोक देता है और कार का दरवाजा खोलकर गाड़ी में रेडियो चला देता है जिसपर 90 के दशक के रोमांटिक गाना आने लगता है। भरत हल्के से सुमित्रा के कमर पकड़ उसके साथ नाचने लगता है। सुमित्रा भरत को ऐसा करता देख थोड़ा घबरा जाती है।

ये आप क्या कर रहे है भरत जी रात हो गई है कोई गाड़ी की आवाज सुनकर उठ गया और हम दोनों को ऐसे नाचते हुए देख लेगा तो पागल समझयेगा! सुमित्रा ने एक मुसकराहट और घबराहट के साथ कहा।

अगर अपनी पत्नी के साथ नाचने वाले व्यक्ति को दुनिया पागल समझती है तो हां फिर मै पागल ही सही! इतना कहकर भरत सुमित्रा के साथ नाचता रहता है।

अब धीरे धीरे सुमित्रा भी अपना हिचक को छोड़ रही थी और भरत के साथ नाचने लगती है। दोनों बाद में गाड़ी में बैठकर घर को रवाना हो जाते है।

गाड़ी से उतरते ही भरत सुमित्रा को अपनी गोद मे उठा लेता है और घर के अंदर जाकर एक कुर्सी पर बैठा देता है। उसकी नजरे सुमित्रा की आंखों को देख रही थी। अब भरत की आंखों में आंसू आने लगते है और वह एकदम से रोते हर कहता है।

मुझे माफ़ करदो सुमित्रा तुमने हमारे रिश्तों के लिए ना जाने कितनी गुमनाम कुर्बानियां दी है और मै ठहरा गंवार जो कभी तुम्हें और तुम्हारे प्रेम को समझ नही पाया मै मानता हूं कि बदलाव तुम्हारे अंदर नही मेरे अंदर आया था लेकिन आज जब मै ऐसी अवस्था मे हूँ तब मै एक असहाय पुरुष की तरह महसूस कर रहा हूँ! भरत इतना कहकर फूटफूट कर रोने लगता है।

अच्छा वो सब तो ठीक है मेरे पतिदेव लेकिन तुम क्लिनिक से गलत मेडिकल रिपोर्ट क्यो उठा ले आये थे कल? सुमित्रा ने हँसते हुए पूछा।

मतलब! भरत एकदम से चोंक जाता है।

मेरा मतलब है कि जब सुबह आप गाड़ी में मेरा इंतज़ार कर रहे थे तब किसी क्लिनिक से डॉक्टर का फ़ोन आया था उन्होंने बताया कि आप उनके 80 साल के बुजुर्ग की मेडिकल रिपोर्ट जल्द बाजी में उठा ले आये है जिन्हें ब्लड कैंसर है लेकिन आपको सिर्फ मौसमी खांसी की शिकायत थी! सुमित्रा ने एक मुस्कराहट के साथ कहा।

अरे, मेरी सुमित्रा मै कितना डर गया था तुम्हे खोने से! इतना कहकर भरत रोते हुए सुमित्रा को गले लगा लेता है।

सुमित्रा भी भरत को अपनी बांहो में ले लेती है।

ये तलाक के कागजात का क्या करे? भरत ने तलाक के कागज उठाते हुए कहा।

सुमित्रा तुंरन्त ही उन्हें फाड़कर फेंक देती है और भरत को गले लगाते हुए कहती है।

“अब इनकी कोई जरूरत नही है”

कहानी समाप्त…..

लेखक – जितेंद्र कुशवाहा

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