काश! उन्हें मै रोक पाता – Krishna Tawakya Singh

| काश ! उन्हें मैं रोक पाता |
जिंदगी दर्द की दास्तान बन जाती है |
जब अपने बिछड़ जाते हैं |
ठीक नहीं होते ,जब रिश्ते बिगड़ जाते हैं |
किसकी कमी कहूँ
या कहूँ किसकी नाकामी
जिंदगी ऐसे मोड़ पर ला देती है
जहाँ मिलती है बस बदनामी |
जड़े जो अबतक मिट्टी के अंदर थी
बाहर से दिखने लगी
एक झरोखा आया
और डालियाँ गिरने लगी |
जड़े फिर से पकड़ पाएँगी कैसे कहूँ
वह मिट्टी के जा पाएँगी कैसे कहूँ |
सूखी डालियों में फूल कैसे उगाऊँ |
बँजर हो गए जीवन में बहार कहाँ से लाऊँ |
काश ! उन्हें मैं रोक पाता
ये हुनर कहाँ से पाऊँ |
रूठे को मना भी लूँ
पर जो टूट गया
उसे कहाँ से जोड़ पाऊँ |
जिंदगी ठहर सी गयी है
अब कहाँ बहती है बयार
जिसके संग बह जाऊँ |

कृष्ण तवक्या सिंह
24.07.2020.

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