जीवन का खेला, बहुत ही अलबेला है – कुमार विशाल

प्यारे -प्यारे लोगों का लगता इस जग में मेला है ,
देख तमाशा जीवन का , ये खेला ही अलबेला है।
ये खेला ही अलबेला हैं।

शदियों की बात पुरानी है, ना मानो तो ये कहानी है ।
मिला है जो कुछ भी हमकों,सब अपनो की मेहरबानी है।
पहन मुखवटा धर्म का, सबने किया झमेला है ,
देख तमाशा जीवन का , ये खेला ही अलबेला है।
ये खेला ही अलबेला हैं।

दोष नहीं है वेद पुराण की, जब कमी हुई गुणगान की ।
ये गजब लीला भगवान की, क्यों कद्र नहीं इंसान की ।
दूर होगा अब अंधियारा कैसे, इस जग का दीपक अकेला हैं।
देख तमाशा जीवन का , ये खेला ही अलबेला है।
ये खेला ही अलबेला हैं।

अपनी कीमत खुद से पूछो , पानी की कीमत प्यासे से।
बन जाओगे शिकार कभी , बच के रहना झूठी झांसे से।
कंकड़, पत्थर रास्ते में आये ,मंजिल तक आते ढेला है।
देख तमाशा जीवन का , ये खेला ही अलबेला है।
ये खेला ही अलबेला हैं।

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