तोहफा प्रकृति का

SHIKHA SHRIVASTAV

राघव ने अल्मोड़ा जाने की सारी तैयारियां कर ली और अपनी पत्नी ‘निधि’ को सरप्राइज देने चल पड़ा।

उसने सुन रखा था बारिश में पहाड़ों का सौंदर्य देखने लायक होता है।

निधि को प्रकृति से बेहद प्यार था।

वो अक्सर राघव से लड़ती रहती थी कि इस कंक्रीट के जंगल में उसे लेकर क्यों आ गया।

राघव मुस्कुराकर कहता “प्रिय, अब तुमने इंजीनियर से शादी की है तो कंक्रीट के जंगल में ही रहना पड़ेगा।

“निधि की खुशी का ध्यान रखते हुए राघव ने घर की बाल्कनी को छोटा सा बगीचा बना दिया था जिसमें हर मौसम के फूलों के पौधे थे, जिन्हें निधि बहुत प्यार से सींचा करती थी अपने बच्चे की तरह।

इसलिये आज जब उन दोनों की ज़िंदगी में मुश्किल घड़ी आयी तो राघव ने सोचा शायद प्रकृति की गोद में ही कोई इलाज मिले।

निधि को जब उसने अल्मोड़ा जाने की बात बताई तो उसने ये कहकर मना कर दिया कि उसे कहीं जाने की इच्छा नहीं है।

राघव ने बड़ी मुश्किल से उसे मनाया।

पहली बार वो दोनों प्रकृति के इस अनुपम सौंदर्य को इतने करीब से देख रहे थे।

राघव निधि को बहलाने की कोशिश करते नहीं थक रहा था, लेकिन अपने ग़म में डूबी निधि कोई खुशी महसूस नहीं कर पा रही थी।

अब पहाड़ों की ढलान से सूरज उतरने लगा था और धीरे-धीरे अंधेरा छाने लगा था।

राघव ने निधि से कहा “चलो होटल वापस चले।”तभी हल्की-हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गयी।

दोनों ने भीगने से बचने के लिए पास के एक चाय दुकान की शरण ली।

तभी निधि की नज़र एक कुतिया पर पड़ी जिसके साथ उसके पिल्ले भी थे।

निधि ने ध्यान से देखा एक पिल्ले का पैर ज़ख्मी था।

उसकी माँ बड़े ही जतन से उसे सहारा देकर धीरे-धीरे ले जा रही थी।

ये देखकर वो बीते दिनों के घटनाक्रमों को याद करने लगी।

कुछ ही महीने पहले निधि को पता चला था वो माँ बनने वाली है।

घर में सब बहुत खुश थे। लेकिन शायद उनकी इस खुशी को किसी की नज़र लग गयी।

कुछ महीनों के बाद जब गर्भ में अपने बच्चे की पहली झलक देखने राघव और निधि अस्पताल पहुँचे तो उन्हें पता चला उनका बच्चा नार्मल नहीं है।

वो शारीरिक अपंगता का शिकार है जो शायद कभी ठीक ना हो।

उनके दुख का कोई ठिकाना नही था।

घर में सभी चाहते थे निधि इस बच्चे को जन्म ना दे क्योंकि वो सिर्फ एक बोझ होगा।

दोनों कोई फैसला नहीं कर पा रहे थे।

अपने बच्चे को खोने की कल्पना भी उनके लिए असहनीय थी।

डॉक्टर ने उन्हें फैसला करने के लिए पंद्रह दिन का वक्त दिया था।

आज कुतिया और उसके पिल्ले को देखकर निधि समझ गयी थी उसे क्या फैसला करना है।

उसने राघव से कहा “जब ये जानवर होकर अपने बच्चे का साथ नहीं छोड़ रही तो हम तो फिर भी इंसान है।

हम अपने बच्चे से उसकी ज़िन्दगी नहीं छीनेंगे।

उसे वैसे ही स्वीकार करेंगे जैसा वो होगा।

ज़िन्दगी के हर कदम पर हम उसे ‘सहारा’ नहीं ‘साथ’ देंगे ताकि वो अपनी कमजोरियों से लड़ सके।

फिर वो किसी पर बोझ नहीं होगा।

“राघव की भीगी नज़रें बयां कर रही थी कि वो इस फैसले में निधि के साथ था।

राघव ने कहा “और आज से हम दोनों बिल्कुल दुखी नही होंगे बल्कि बहुत खुश रहेंगे ताकि हमारे बच्चे के होंठो पर भी हमेशा मुस्कान खिली रहे।

“एक लंबे अरसे के बाद दोनों एक-दूसरे के आंसू पोंछते हुए मुस्कुरा दिए।

पावस ऋतु की मोहक बेला में प्रकृति ने आखिरकार राघव और निधि के जीवन की खोई हुई सुंदरता उन्हें वापस कर दी थी।

वक्त अपनी रफ्तार से गुजरता गया।

आज राघव और निधि की बिटिया ‘उजाला’ पैरा-ओलंपिक में अपने देश का प्रतिनिधित्व कर रही थी।

स्वर्ण पदक स्वीकार करते हुए उजाला ने कहा “ये मेरी नहीं मेरे माँ-पापा के हौसलों की जीत है।

जिन्होंने मेरी शारीरिक कमजोरी के बावजूद कभी मुझे किसी से कमतर महसूस नहीं करवाया।

हर कदम पर मेरे साथी बनकर रहे चाहे वो परिवार के लोगों की उपेक्षित नज़रें हों या समाज से मिली हुई सहानुभूति, उन्होंने किसी का मुझ पर असर नहीं होने दिया और इस तरह मेरी परवरिश की, कि आज मुझ पर हँसने वाले, दया करने वाले या मुझे अपने से हीन समझने वाले लोग मुझसे सम्मान से पेश आते है।

माँ-पापा आप मेरे हीरो है।

“उजाला की बात सुनकर स्टेडियम में मौजूद सभी लोगों ने राघव और  निधि के सम्मान में तालियां बजायी।

टेलीविजन पर उजाला को देखते हुए राघव और निधि एक-दूसरे की आँखों से बहने वाले खुशी के आँसुओं की गर्माहट को अंदर तक महसूस कर रहे थे।

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