नरसिंह का भात – कहानी भक्ति की पार्ट 1

   अध्याय – 1 नरसिंह का पूर्वजन्म   


नरसिंह के भात से जुडी कई कहानिया प्रचलित है लेकिन इससे जुडी कहानी ना सिर्फ भक्ति पर आधारित है बल्कि समाज में एक धर्म की भावना को भी विकसित करती है हिन्दू धर्म एक विश्व व्यापक रहस्यों से भरा हुआ है कुछ विज्ञान मानते है तो कुछ अध्यात्म। ये कहानी ईश्वरीय शक्ति का इस दुनिया में होने की साक्षी है तो इस कथा को जरूर पढ़िए। 

एक समय की बात है। एक व्यापारी का समूह द्धारका की तरफ बढ़ रहे थे जिसमे से एक व्यापारी अपना पथ भटक जाता है और एक जंगल के बीचो बिच से जा रहा था। उसी रस्ते पर एक शेर की गुफा थी। वह शेर अपनी गुफा से तुरंत ही बाहर आ गया और उस व्यापारी की तरफ लपका जिसकी वजह से व्यापारी के मानो पैरो के नीचे से जमींन ही खिसक जाती है। 

शेर महाराज कृपया मेरे प्राण बक्श दीजिये! उस व्यापारी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। 

कँहा जा रहा है? शेर ने दाहड़ाते हुए पूछा

एक शेर इंसानी भाषा में बात कर रहा है? उस व्यापारी ने चौंकते हुए मानो अपने आप से ही पूछा। 

 मेरी गुफा के पास एक साधु झोपडी थी जब मै उसको खाने गया तब उसने अपने प्राणो के बदले मुझे ये वरदान दिया की बोल सकू! शेर ने जबाब दिया। 

मै द्वारका नगरी में भगवान श्री कृष्ण से मिलने जा रहा हूँ!  उस व्यापारी ने जबाब दिया। 

तो ठीक है मै तेरे प्राण दान देता हूँ लेकिन इसके बदले मेरा एक काम करना होगा! इतना कहकर शेर अपनी गुफा में जाता है और जिन लड़कियों को उसने खाया होता है उनके अभूषण लेकर उस व्यापारी को दे देता है। 

तुम  इन गहनों को ले जाओ भगवान् श्रीकृष्ण को दे देना! इतना कहकर शेर अपनी गुफा में वापस चला जाता है

नरसिंह भात की कहानी

वो व्यापारी जैसा शेर कहता है वैसे ही द्वारका में जाकर श्री कृष्ण को वो गहने दे देता है मुरलीधर उन गहनों को देखकर मुस्करा जाते है और उसे दो कंगन देते है और वापस उसी शेर को दे देने को कहते है लेकिन जब व्यापारी वापस आता है तो वह मन में सोचता है की पिछली बार तो शेर ने उसे खाने से छोड़ दिया था क्योंकि उसका काम था लेकिन अगली बार वह उस रास्ते से गया तो शेर उसे पक्का खा जायेगा इसलिए वह अपना रास्ता बदल लेता है लेकिन वो शेर उस रास्ते पर भी पहुँच जाता है और व्यापारी पर गुस्सा होते हुए कहता है 

तू कंहाँ जा रहा था बिना मुरलीधर का संदेश दिए

शेर को देख वयापारी घबरा जाता है और गिड़गिड़ाने लगता है। 

हे जंगल के राजा मै दरअसल डर गया था कृपया मुझे माफ़ कर दे! व्यपारी ने डरते हुए जबाब दिया।

ठीक है ला क्या संदेश दिया है मेरे श्याम सुंदर ने? शेर ने पूछा।

उन्होंने यह कंगन आपको दिए है महाराज! इतना कहकर कंगन व्यापारी शेर के समक्ष रख देता है।

शेर उन कंगनों को देखकर मुस्करा देता है और खुश होकर कहता है कि इन कंगनों को मुझे पहना दे।

व्यापारी शेर के कहे अनुसार कंगन को पहना देता है और फिर वो व्यापारी चला जाता है और शेर अपनी मांद के पास आकर नाचने लगता है मानो उसे कृष्ण की बांसुरी सुनाई दे रही हो वह नाचते नाचते ही अपने प्राण त्याग देता है। 

नरसिंह भात की कहानी

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