नज़रें चुराने लगे हो – लोकेश कुमार ‘रजनीश ‘

धीरे धीरे मुझसे दूर होने लगे हो
गैर की बांहों में जो सोने लगे हो |

मेरे जैसी कायनात में दूसरी नहीं
किसे मुझसे बेहतर कहने लगे हो |

फ़िरोज़ी आंखें,रेशमी ज़ुल्फ़ें, गुलबदन
किस हुस्न की बला पर मरने लगे हो |

रात गुज़र जाती है आपकी तड़पते हुए
यूँ किसकी यादों में आहें भरने लगे हो |

मैं तरसती हूँ तुमसे अपना हाल पूछने को
और तुम हो कि गैर की फ़िक्र करने लगे हो!

तुम चाहने लगे किसी और को मैं जानती हूँ
इसीलिए तुम मुझसे नज़रें चुराने लगे हो|

लोकेश कुमार ‘रजनीश’

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