पूरनमल एक स्वादिष्ट साधु पार्ट 4

          अध्याय – 4 चीन की राजकुमारी


पूरनमल राजकुमारी सुंधाधि के महल के बाहर जाकर भिक्षा के लिए आग्रह करता है लेकिन द्वारपाल उसे रोक देते है।

दिखने मै तुम समझदार लगते हो साधु महाराज! फिर क्यो अपनी म्रत्यु को निमंत्रण देने आए हो अगर राजकुमारी को पता चल गया तो वह तुम्हे तुंरन्त मार देगी! द्वारपाल इतना कहकर पूरनमल को वापस जाने का आग्रह करते है।

लेकिन पूरनमल जाने से मना कर देता है और भिक्षा के लिए आवाज लगाता है।

आवाज सुनकर सुंधाधि की नींद टूटी जाती है और वह तुंरन्त ही अपनी तलवार लेकर दरवाजे पर जाती है लेकिन जैसे ही उसकी नजर पूरनमल पर पड़ती है वह एक दम से रुक जाती है और पूरनमल के खूबसूरत चेहरे पर फिदा हो जाती है उसके हाँथ से उसकी तलवार भी छूट जाती है।

एक इतना सुंदर नोजवान एक साधु? हे आर्य कौन है आप? सुंधाधि पूरनमल से पूछती है।

मै एक साधु हूँ देवी मेरा नाम पूरनमल है! पूरनमल अपना परिचय देता है।

हे आर्य आइये मेरे महल में आइये! इतना कहकर सुंधाधि पूरनमल को अपने महल में ले जाती है।

भिक्षा दीजिए देवी मेरे गुरु गोरखनाथ मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे! पूरनमल ने कहा।

भिक्षा क्या आर्य मै तो आपकी हो गई हूं आप मुझसे शादी कर लीजिए और अपने साथ ले जाइए! सुंधाधि इतना कहकर पूरनमल का हाँथ पकड़ लेती है।

ये क्या पाप कर रही है देवी! मैने वैराग्य को अपना धर्म चुन लिया है इसलिए मै आपसे विवाह नही कर सकता हूँ! पूरनमल तुंरन्त ही खड़ा हो जाता है।

तुम्हे अंदाजा भी है कि तुम किसे शादी के लिए मना कर रहे हो विश्व सुंदरी सुंधाधि को जो कि चीन की राजकुमारी है इसका परिणाम तुम्हे भयंकर मिल सकता है! इतना कहकर राजकुमारी अपना कटार उठा लेती है।

हे देवी अपने धर्म को कायम रखने के लिए मृत्यु भी लेने पड़ी तो मै ले लूंगा लेकिन अपना धर्म त्याग नही कर सकता हूँ! इतना कहकर पूरनमल जाने लगता है।

लेकिन पीछे से सुंधाधि पूरनमल तलवार घोप देती है जिसकी वजह से पूरनमल जमीन पर धराशायी हो जाता है। जैसे ही पूरनमल जमीन पर गिरता है तभी गुरु गोरखनाथ की आंखे खुल जाती है वह समझ जाते है कि पूरनमल ने धर्म के खातिर फिर अपनी जान दे दी है इसलिए गोरखनाथ तुंरन्त ही गायब होकर उस महल में पहुंच जाते है और जैसे ही उनकी नजर पूरनमल पर पड़ती है वह फूटफूटकर रोने लगते है।

हाये मेरे बच्चे ना जाने धर्म के खातिर तेरी कितनी मोते लिखी हुई है लेकिन जब तक तेरा गुरु गोरखनाथ है वह तुझे कभी नही कुछ नही होने देगा! इतना कहकर गोरखनाथ फिर से पूरनमल में जान फूंक देते है और फिर गुस्से से राजकुमारी सुंधाधि को देखते है जो कि यह दृश्य देखकर असमंजस में पड़ चुकी थी। वह तुंरन्त ही गोरखनाथ के पैरों में गिर जाती है।

हे बाबा मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई है मै आपको और आपके इस शिष्य को पहचान नही पाई! इतना कहकर सुंधाधि रोने लगती है।

देवी तुमने इतने साधुयो को मारा है कि तुम्हारे घर का खाना भी हमे अधर्म लगेगा इसलिए मै और पूरनमल यंहा से जा रहे है! इतना कहकर गोरखनाथ पूरनमल के साथ जाने लगते है।

रुक जाइये महाराज! मुझे मेरी गलती का पश्चताप करने का एक मौका तो दीजिए! इतना कहकर सुंधाधि गोरखनाथ के पैर पकड़ लेती है।

ठीक है पुत्री मुझे लगता है तुम्हे तुम्हारी गलती का अहसास है! इतना कहकर गोरखनाथ पूरनमल के साथ खाना खाने बैठ जाते है।

राजकुमारी सुंधाधि दोनों साधुयो का विशेष ध्यान रखती है जिससे खुश होकर गोरखनाथ सुंधाधि को एक वरदान मांगने को कहते है।

महाराज अगर आप मुझे वरदान ही देना चाहते है तो कृपया करके मुझे पूरनमल दे दीजिए वह यंही रह कर अपनी पूजा कर सकता है और मै उनकी दासी बनकर सेवा करती रहूंगी! सुंधाधि हाँथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक निवेदन करती है।

ये क्या कह रही हो देवी यह हम कैसे तुम्हे वरदान दे सकते है! गोरखनाथ एकदम से उठ खड़े होते है।

लेकिन आपने ही तो मुझे वरदान मांगने को कहा था गुरुवर अगर आप मुझे वरदान ही नही दे सकते तो आपने इस क्यो कहा! सुंधाधि एकदम से गुस्से में उठ जाती है

लेकिन देवी ये पूरनमल को इच्छा के विरुद्ध मै कैसे अपने शिष्य का दान तुम्हे दे सकता हूँ! इतना कहकर गोरखनाथ बेचैन होकर सुंधाधि को देखने लगते है।

गुरु देव गुरु की सेवा ही एक शिष्य का धर्म होता है याद कीजिये जब मै यशुतनाथ के रूप में था तब भी मैने आपकी सेवा कोही अपना कर्तव्य समझा था और आज इस रूप में भी मै आपके लिए अपने आप को दान दे सकता हूँ! इतना कहकर पूरनमल अपने गुरु गोरखनाथ के चरण स्पर्श कर लेता है।

है मेरे पुत्र पूरनमल तुम जैसा शिष्य पाकर मै सच मे धन्य हो गया! गोरखनाथ इतना कहकर वंहा से चले जाते है।

समय बीतता जाता है और पूरनमल उसी महल में रहकर अपने वैराग्य जीवन को जीने लगता है लेकिन सुंधाधि हर वक्त किसी ना किसी तरह पूरनमल को अपने झांसे में लेने की कोशिश करती रहती है।

एक दिन जब पूरनमल ध्यान में मग्न होता है तभी राजकुमारी सुंधाधि पूरनमल के कान में कुक करके हँसने लगती है और जबरन अपनी बांहे पूरनमल के कंधों पर डालने लगती है।

लेकिन पूरनमल जय गोरखनाथ कहकर वंहा से गायब हो जाता है और सीधा अपने गुरु गोरखनाथ के पास पहुंच जाता है।

अरे पूरनमल तुम यंहा कैसे? गोरखनाथ एकदम से पूरनमल को देखकर चोंक जाते है।

लेकिन पूरनमल कुछ बोल नही पाता वह बस हाँफता रहता है इसलिए गोरखनाथ उसके माथे पर हाँथ रखते है और एकदम से पीछे हट जाते है।

पूरनमल ये क्या अनर्थ कर आये तुम? गोरखनाथ अपना सिर पकड़ते हुए बोले।

मैने क्या किया गुरु जी मै तो बस अपने धर्म की रक्षा कर रहा हूँ! पूरनमल ने बड़ी मासूमियत से जबाब दिया।

पूरनमल तुमने अपने धर्म की रक्षा में एक जीव हत्या का पाप ले लिया है क्योंकि राजकुमारी सुंधाधि ने तुम्हारे वियोग में जान दे दी है! गोरखनाथ ने चिंतित होते हुए कहा।

क्या! पूरनमल एक दम से घबरा जाता है।

चलो पूरनमल हमे राजकुमारी सुंधाधि को वापस जीवित करना होगा वरना इस पाप का भागीदार हम दोनों ही हो जाएंगे! इतना कहकर गोरखनाथ पूरनमल के साथ राजकुमारी की लाश के पास पहुंचते है।

गोरखनाथ तुंरन्त ही राजकुमारी सुंधाधि को जीवित कर देते है जैसे ही सुंधाधि कि नजर खुलती है वह तुंरन्त ही रोने लगती है।

हे महाराज मै कितनी बड़ी पापिन हूँ मै एक साधु का धर्म भृष्ट करने चली थी! इतना कहकर सुंधाधि रोने लगती है।

हे देवी सभी लोगो के धर्म अलग अलग होते है जो उन्हें ईश्वर तक ले जाते है पूरनमल एक सच्चा भक्त है जिसने अपनी जान गवा दी लेकिन अपना धर्म नही खोया! गोरखनाथ ने सुंधाधि को उठाते हुए कहा।

मुझे भी अपनी शिष्य बना लीजिए गुरु जी ! सुंधाधि का आत्म प्रतिवर्तन देखकर गुरु गोरखनाथ उसे अपनी शिष्य बना लेते है और अब पूरनमल को धर्म की बहन सुंधाधि हो जाती है। क्योंकि दोनों के गुरु एक ही थे।

गुरु गोरखनाथ वापस अपनी मंडली के सतग गोरखपुर आ जाते है और रहने लगते है।

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