प्रेत की मुक्ति (कहानी) – Sadarpuria honey ‘કૃષ્ણપ્રેમી’

प्रेत की मुक्ति

रात के करीब १:३० बज रहे होंगे , घोर अंधेरा था , ऊपर से ये मुसलाधार बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। बिजलियाँ भी कड़क रही थी  जो इस रात को ओर भयावय बना रही थी। ऐसी रात में सिद्धार्थ अपनी गाड़ी को जंगल के रास्ते फूल स्पीड में भगा रहा था।
सिद्धार्थ अमीरगढ़ जा रहा था महल देखने जिसे वो होटल में तब्दील करना चाहता था। सिद्धार्थ के पापा जाने माने बिज़नेस मैन थे और सिद्धार्थ भी उनके इस बिज़नेस को आगे बढ़ाना चाहता था।  ये उसका पहला प्रोजेक्ट है इस लिए इसे पूर्ण करने के लिए वो उत्सुक था , पर  देर से निकलने के कारण रात हो चुकी थी। गाड़ी चलते चलते अचानक खराब हो गई और ना चाहते हुए भी उसे गाड़ी सड़क के पास खड़ी करनी पड़ी। बारिश अभी भी चालू थी रास्ता पूरा सुनसान था कोई आवाजाही नहीं थी सिद्धार्थ को कोई लिफ्ट मिलने की भी कोई उमीद नज़र नहीं आ रही थी । फ़ोन में नेटवर्क भी नहीं आ रहा था वो बहुत परेशान था।

कुछ देर बाद उसे दूर से एक बुलेट आती नजर आईं। सिद्धार्थ को मानो उम्मीद की किरण नजर आईं थीं। उसने गाड़ी से उतर कर उस बुलेट वाले को हाथ दिखाया उस बुलेट वाले ने अपनी बुलेट रोकी ,
“जी मेरी गाड़ी खराबी हो चुकी है आप यहां के लगते है क्या यहां आस पास कहीं मेकैनिक मिलेगा”?
“शहर यहां से दूर है रात भी बहुत हो चुकी है इतनी रात को यहां कोई आता जाता भी नहीं सुबह होने तक आपको कोई मेकैनिक नहीं मिल सकता। आप मेरी मानो तो यहाँ पास में एक होटल है , मैं आपको वहाँ तक छोड़ सकता हूँ “। आप वहा आराम से रहिए सुबह होते ही अपनी गाड़ी रिपेयर करा के निकाल जाना ।

वैसे तो सिद्धार्थ इतनी जल्दी किसी पर भरोसा नहीं करता पर अभी उसके पास कोई चारा नहीं था। वो पूरी रात इस सुनसान सड़क पर नहीं बिताना चाहता था ।
और वो आदमी भी उसे भला इंसान लग रहा था , पर ऐसी जगहों पर चोर लुटेरों का खौफ रहता है , इस लिए सिद्धार्थ कोई रिस्क लेना नहीं चाहता था। वो अपनी गाड़ी में से अपनी लाइसेंस्स वाली गन निकाल कर अपनी जीन्स में छुपा देता है , और जाकर उस आदमी के पीछे बैठ जाता है।
“ओर भाई बताओ आप इतनी रात को कहाँ जा रहे थे”?
“अरे भाई कुछ नहीं बस अपने कुछ काम से अमीरगढ़ जा रहा था”
“और आप इतनी रात को बुलेट लेके सड़कों पर घूमने निकले हो क्या”?
“ऐसा ही समझ लो , मैं आपके जैसे रात को फंसे लोगो की मदद करने निकलता हूँ ”।

ये सुनकर सिद्धार्थ हँसने लगता है,
“भाईसाहब आप बहोत मज़ाकिया किस्म के प्रतीत होते हो”। ऐसे ही बाते करते करते वो लोग होटल पहूँचते हैं। “लो भाई आ गया होटल , अब में चलता हूँ ”।

सिद्धार्थ होटल को देख के आश्चर्यचकित हो जाता है। वो होटल महल लग रहा था ,
वाह ….! ऐसी जगह पर किसने इतना खूबसूरत होटल का निर्माण करवाया होंगा?
सिद्धार्थ उस आदमी का शुक्रिया अदा करने के लिए पीछे मुड़ता है पर मानो वो आदमी जैसे हवा में विलीन हो गया ना बुलेट की आवाज़ आई आख़िर वो गया तो गया कहा? सिद्धार्थ को ये बहुत अजीब लगता है। फिर सिद्धार्थ उस बात को नज़रअंदाज़ करके
होटल में जाता है। जहां एक 21 साल का नो जवान गोरा रंग काली दाढ़ी ओर मूँछे पूरे राजपूती लिवास पहने खड़ा था।
“आइए आपका स्वागत है हमारे इस महल में…..”
सिद्धार्थ उसके स्वभाव ओर उसकी आवाज से प्रभावित होता है , सिद्धार्थ अंदर जाता है ये होटल जितना बहार से सुंदर था उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत अंदर से था। सिद्धार्थ को लग रहा था मानो वो समय के पीछे चला गया हो , वो किसी राजा के रजवाड़े में आ गया हो ऐसा लग रहा था । फिर वो युवक अपने किसी सेवक से कहता है , “मेहमान को अथितिकश दिखाओ ओर उनके भोजन का प्रबंध करो ” ……। सिद्धार्थ को ये सब बहुत अजीब लग रहा था , पर ये इनके होटल का तरीका होगा ग्राहक को खुश करने का ,
ऐसा सोचकर वो बात को टाल देता है। वो सेवक उसे रूम तक छोड़कर बिना कुछ बोले चला जाता है। सिद्धार्थ रूम के अदर जाता है रूम बहुत खूबसूरत था वो बाकी होटल की तरह नहीं था। वो फिल्मों में दिखाए जाने वाले राजपरिवारों के रूम जैसा था । सिद्धार्थ को राजकुमार वाली फीलिंग आ रही थी।थोड़ी देर में वो युवक वापस आता है ओर कहता है …..
“भोजन तैयार है आप आके भोजन ग्रहण कर लीजिए” । सिद्धार्थ नीचे जाता है और देखता है डायनिंग टेबल पर तरह तरह के पकवान रखे हुए थे , वो ये सब देखकर बहुत खुश हो जाता है। वो युवक वही पर खड़ा था , सिद्धार्थ उनसे पूछता है आप अपने सभी ग्राहक को इसी तरह ट्रीट करते है? ग्राहक नहीं अतिथि हम हमारे यहाँ अतिथियों को इस तरह रखते है। अगर आपके अतिथि-सत्कार में हमसे कुछ भूल हो गई हो तो हम क्षमा चाहते है। अरे नहीं मुझे आपका व्यवहार बहुत पसंद आया , और ये खाना भी बहुत स्वादिष्ट है ।

सिद्धार्थ खाना खाने के बाद जाकर सो गया , पर जब वो सुबह जागता है तो वो चौंक जाता है , क्योंकि वो जंगल के मध्य किसी पुराने टूटे फूटे खंडर के अंदर जमीन पर पड़ा था ।उसका दिमाग पूरी तरह घूम रहा था ,
उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि आख़िर उसके साथ हुआ क्या ? ये किस तरह का चमत्कार था ! वो युवक कौन था ? ये महल एक खंडर में कैसे तब्दील हो गया ? उसे विश्वास नहीं हो रहा था क्या जो कुछ भी रात को देखा वो सिर्फ सपना था या सच ! कई सारे सवाल सवाल उसके दिमाग़ में चल रहे थे। वो यही सब कुछ सोचते हुए…जंगल के बहार आता है तो उसे एक और झटका लगता है , उसकी गाड़ी उसके सामने खड़ी थी । ये गाड़ी तो बिगड़ने के कारण मैं वही रास्ते पर छोड़कर आया था तो फिर यह यहां कैसे अा गई ? वो मन ही मन इस रहस्य का पाता लगाने का निश्चय करता है , और अपनी गाड़ी में बैठकर गाड़ी को चालू करता है ।
जो गाड़ी रात को चालू होने का नाम ना ले रही थी वो , एक ही बार में चालू हो जाती है।

सिद्धार्थ ने इतना कुछ देख लिया था कि गाड़ी चालू होना उसे कोई बड़ी बात नहीं लगी। फिर निकल पड़ता है अमीरगढ़ के महल को देखने कुछ मिनटों तक गाड़ी चलाने के बाद
सिद्धार्थ अमीरगढ़ के महल पहुंच जाता है महल पहुंचने के बाद वो महल को देखता है…महल काफी खूबसूरत था उसे यह महल बहुत पसंद आता है , किंतु पूरा दिन उसके दिमाग में वह खंडर ही घूमता रहता है। उसे मालूम तो करना था उस खंडर का रहस्य पर वो इस बारे में किसी को नाही बता रहा था नाही पूछ रहा था। शायद उसे लग रहा था कि ऐसा करने पर लोग उसे पागल समझेंगे। वो उस खंडर का रहस्य अपने आप पता लगा लेगा ऐसा मन ही मन में निश्चय करता है…वो शाम को जानबूझकर देर से निकलता है ताकि वो उस खंडर के अंदर जाकर पता लगा सके की आख़िर ये माजरा क्या है!

वो रात के करीब १ बजे उसी जगह पहुँचता है
वो खंडर वापिस महल में तब्दील हो चुका होता है। सिद्धार्थ हिम्मत करके वापिस उस महल में जाता है वहाँ उसे वो युवक फिरसे मिलता है। वो युवक सिद्धार्थ को कहता है “आइए आपका पुनः स्वागत है”…..इस बार सिद्धार्थ उस युवक के पैरो में गिर जाता है , और बोलता है ….. कृपया आप मुझे बताए आप कौन है ? “उठिए आप हमारे अतिथि हैं ….और हमारे अतिथि हमारे लिए भगवान के समान होते है” । वो युवक सिद्धार्थ को खड़ा करता है और कहता है …..“आपको सब कुछ बताऊंगा पहले आप अंदर आइए”।फिर सिद्धार्थ उस युवक के साथ महल के अंदर जाता है , जहां वो युवक और सिद्धार्थ कुर्सियों पर बैठते हैं , फिर वह युवक बोलना शुरू करता है …..

तो आप जानना ही चाहते हो कि मैं कौन हूँ ?…. तो सुनिए , मैं एक प्रेत हूँ एक भटकती आत्मा हूँ जो अपनी मुक्ति के लिए भटक रही है , ये सब मेरी माया है , हाँ … यह सिर्फ और सिर्फ माया है, ये सब हकीकत नहीं है।
“मैं आपका रिणी हूँ आपने मेरी मदद की आप मुझे आपकी मुक्ति का मार्ग बताइए में आपकी मुक्ति करवाऊंगा”।
“तुम्हारी गाड़ी का यहां पर बिगाड़ना शायद भगवान का संकेत था मेरी मुक्ति के लिए”।
“अगर तुम मेरी मुक्ति कराना चाहते ही हो…
तो तुम्हे पहले मेरे प्रेत बनने का कारण जानना पड़ेगा तब जाके तुम्हे रास्ता मिलेगा मेरी मुक्ति का”। “जी , आप बताइए आप किस तरह से एक प्रेत बने और कब से भटक रहे हों “?
तो सुनो , अभी जिस महल को देखकर तुम अा रहे हो जिसे तुम होटल में तब्दील करना चाहते हो…आज से कई सालों पहले वो हमारा महल हुआ करता था मेरे पिता यहां के राजा थे जिनका नाम “महाराजा सूर्यप्रताप सिंह” था और मैं वहाँ का राजकुमार था …. “राजवीर सिंह”। मेरे पिता के बाद राजगद्दी मुझे ही मिलने वाली थी । उन दिनों मेरी नई नई शादी हुई थी मेरी पत्नी का नाम “चंद्रमुखी” था। जैसा उसका नाम था वैसे ही वह खूबसूरत थी खूबसूरती , के साथ वो गुणियाल भी थी शस्त्र और शास्त्र दोनों का ज्ञान रखती रखती थी । मैं उसे बहुत प्यार करता था इस लिए उसके लिए यहां पर एक सुंदर महल का नर्माण करना चाहता था , ताकि उसके साथ एकांत में थोड़ा समय व्यतीत कर सकूँ । सब कुछ सही चल रहा था महल के निमार्ण का कार्य भी शुरू हो चुका था , हम सब बहुत खुश थे हमारी प्रजा भी सुखी थी। फिर मानो जैसे किसी की बुरी नजर हमारे राज्य पर लग गई…मुगल सैन्य ने हमारे राज्य पर हमला कर दिया। पहले उस मुगल ने हमें उसको समर्पित होने की चेतावनी दी थी , पर मेरे पिताजी स्वाभिमानी थे , वो झुकने से अच्छा युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त होना पसंद करते थे। मुगलों की सेना हमारी सेना से बहुत बड़ी थी और उनके पास गोला बारूद जैसे ख़तरनाक हथियार थे। युद्धभूमि में हमारी हार निश्चित थी पर
झुकना हम राजपूतों के उसूलों में नहीं था ।

मेरे पिताजी ने मुझे और मेरी पत्नी को कहा कि इस युद्ध में हमारी हार निश्चित है और मेरी वीरगति भी तुम मेरे एक मात्र संतान हो इस लिए हमारे वंश को बढ़ाने के लिए और हमारा राज्य वापस हासिल करने के लिए तुम्हारा जिंदा रहना बहुत जरूरी है। तुम दोनों यहां से अपने मामा जी के राज्य चले
जाओ। मैं इस तरह सब को इन हालातो में छोड़कर नहीं जाना चाहता था , पर फिर मेरी माता और पिता के दबाव के कारण मुझे उनका कहना मानना पड़ा। मैं जाने के लिए तैयार हो गया पर तब चंद्रमुखी ने मुझसे कहा कि तुम जैसे कायर पति को पाकर मेरा ये जीवन तो विफल हो गया , यहां तुम्हारी प्रजा संकट में है युद्ध चल रहा है और तुम यहां से कायरों की भांति भाग रहे हो …..! ये सुनकर मेरा राजपूती खून खोल उठा …..मैने निश्चय कर लिया की अब युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त करूंगा , पर अपनी इस मात्रभूमि को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा। मेरे माता पिता ने मुझे समझाने की बहुत कोशिश की पर मैने उनकी इस बार एक ना सुनी और केसरिया धारण कर लिया। मैने युद्धभूमि में जाने से पहले अपनी पत्नी से कह दिया की मेरी राह न तके और उसने भी मुझे कहा कि अब स्वर्ग में हमारी भेट होंगी। फिर मैं युद्धभूमि में चला गया जहां लड़ते लड़ते में काफी घायल हो गया था मेरी आखिरी सांसे चल रही थी
तब मेरे जहन में मेरी पत्नी का ही ख़याल चल रहा था। मैने उसके लिए जो महल का निमार्ण करवाया था , वो पूरा नहीं हो पाया था बस एक यही मेरी अधूरी इच्छा रह गई थी। मैंने वीरगति को प्राप्त किया। मेरे पिता जी भी वीरगति को प्राप्त हुए थे , हमारी हार हो चुकी थी , हमारा पूरा वंश इस युद्ध में समाप्त हो चुका था। मेरी पत्नी ने भी जोहर कर लिया और सती बन गई थी। मैं अधूरी इच्छा के कारण प्रेत योनि को प्राप्त हुआ , मैं मेरी आखिरी क्षणों में इस महल के बारे में सोच रहा था इस लिए मेरी आत्मा यहां आकर कैद हो गई । मेरी पत्नी सतीमाता होने के कारण मृत्यु के बाद हमारामिलन संभव नहीं हुआ”।

कहानी को सुनकर सिद्धार्थ की आँखों में पानी अा गया और वो बहुत भावुक भी हो गया था। अब उसने निश्चय कर लिया था कि किसी भी तरह से इन्हें मुक्ति दिला के रहेगा ।“आपके बारे में जानकर मुझे गर्व हो रहा है कि में आप जैसे वीर पुरूष के साथ बैठा हूँ ।आप बस अब इतना बता दीजिए कि आपकी मुक्ति कैसे संभव है , मैं वह सब करने को तैयार हूँ जिससे आपकी मुक्ति हो सके”।
सिद्धार्थ की बातें सुनने के बाद वह युवक कहता है कि , “अभी भी नहीं समझें ! मरने से पहले मेरी आखिरी इच्छा यह थी की इस महल का निमार्ण कार्य पूर्ण हो। इसलिए मेरी मुक्ति तभी हो सकती है जब इस महल का निर्माण कार्य कार्य पूर्ण होगा”। “मैं आपको वचन देता हूँ कि आपके इस महल का अधूरा निमार्ण कार्य मैं पूरा करवाऊंगा और आपकी इस प्रेत योनि से मुक्ति करवाऊंगा ”। मुझे तुम पर और तुम्हारे वचन पर पूरा भरोसा है । शायद इतने सालो तक मुझे तुम्हारा ही इंतजार था।

फिर सुबह होते ही सिद्धार्थ काम पर जुट जाता है… कुछ ही महीनों में वह उस महल का अधूरा निर्माण कार्य पूर्ण करवाता हैं ,
महल में सतीमाता और राजवीर सिंह की प्रतिमा को भी स्थापित करावता है । इसी के साथ राजवीर सिंह को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है और वो सिद्धार्थ का शुक्रिया अदा करके आकाश में विलीन हो जाते हैं।

फिर स्वर्ग में राजवीर सिंह की भेट सतिमाता चन्द्रमुखी से हो जाती है।

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