मेरे देश की मिट्टी

©शिखा श्रीवास्तव ———————–

एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर पिछले छः घंटे से चल रही मीटिंग आखिरकार खत्म हुई और सब लोग दफ्तर से घर जाने के लिए निकल गए।

अंशुमन जो उस कंपनी का मालिक था, चुपचाप अपने केबिन में चला गया और थकान से अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे ही आँखें बंद कर ली।

“सर, आप घर नहीं जाएंगे क्या?” मैनेजर विक्टर की आवाज़ सुनकर अंशुमन ने आँखें खोली।

“तुम जाओ विक्टर, मैं अभी थोड़ी देर यहीं रहूंगा।” कहकर अंशुमन ने फिर से आँखें बंद कर ली।

“क्या करूंगा मैं घर जाकर? वहां कौन है जिसे मेरा इंतज़ार है? ना पत्नी को अपनी पार्टियों से फुरसत है ना बच्चों को। घर में साथ बैठकर कुछ वक्त बिताना तो इन सबको पुराने जमाने का फैशन लगता है।” अंशुमन ने मन ही मन खुद से बातें करते हुये कहा।

तभी उसे यूँ लगा जैसे उसके सामने कोई खड़ा है। अंशुमन ने आँखें खोलकर ध्यान से देखा तो ये तो बिल्कुल उसके जैसा दिखने वाला ही कोई शख्स था।

उस शख्स ने अंशुमन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा “अब क्यों रो रहे हो तुम अपने अकेलेपन पर? विदेश में बसने की चाहत लिए तुम भी तो अपने अपनों को अकेला छोड़ आये थे। ग्रीन कार्ड की लालच में जब विदेशी संस्कृति की लड़की से शादी की, तो फिर अब उसमें अपनी संस्कृति की परछाईं ढूंढने की व्यर्थ कोशिश क्यों कर रहे हो?”

उस शख्स की बात सुनकर अंशुमन को झटका सा लगा और उसने पूछा “कौन हो तुम? तुम्हें ये सब कैसे पता है?”

“क्योंकि मूर्ख, मैं तुम्हारी अंतरात्मा हूँ, जिसकी आवाज़ को सुनना तुमने कब का बंद कर दिया है, लेकिन आज तुम्हें यूँ दुखी देखकर मुझे आना ही पड़ा।” उस शख्स ने कहा।

ये सुनकर अंशुमन ने उस शख्स को छूने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया वो गायब हो गया।

कुछ देर के बाद आखिरकार थका हुआ अंशुमन घर जाने के लिए निकला। घर पहुँचकर उसने नींद की गोलियां ली और फिर बिस्तर पर लेटते ही ना जाने कब उसकी आँख लग गयी।

आधी रात बीत चुकी थी। चारों तरफ गहरा सन्नाटा पसरा था। अचानक ही अंशुमन की आँख खुल गयी। आज उसने फिर वही सपना देखा जो पिछले कई सालों से कभी-कभी अचानक आकर उसे बेचैन कर देता था।

सपने में वो हमेशा देखता था ज़मीन का एक टुकड़ा जिसमें जगह-जगह दरारें पड़ी हुई थी और उन दरारों से कुछ रिस रहा था जैसे वो आँसू हो और फिर सुनाई देती थी एक करुण पुकार “मुझे बचा लो मनु”।

‘मनु’ इस नाम से अंशुमन को सिर्फ उसके माता-पिता बुलाया करते थे, जो भारत में एक छोटे से गांव में रहते थे। अमेरिका आने के बाद बस एक बार ही अंशुमन उनसे मिलने गया था अपनी अमेरिकी पत्नी ‘रोजी’ को लेकर। ना रोजी उन लोगों को अपना सकी, ना वो लोग रोजी के साथ सहज हो सके। फिर धीरे-धीरे अंशुमन अपने कारोबार को बढ़ाने में यूँ व्यस्त हो गया कि महीने में एक बार कुछ पैसे माता-पिता को भेजकर ही अपने पुत्र-धर्म की इतिश्री कर ली। और इसमें कभी उसे कुछ गलत भी नहीं लगा।

माता-पिता की मृत्यु पर भी वो भारत नहीं जा सका। उसके व्यापारी दिमाग ने कहा “अब जब वो नहीं ही रहे दुनिया में तो जाकर क्या करोगे?”

पड़ोसियों ने ही उन दोनों का अंतिम संस्कार किया जिसके बदले मात्र एक फोन कर उन सबका आभार व्यक्त करके अंशुमन ने खुद को सारे ऋणों से मुक्त समझ लिया।

आज दफ्तर में जब उसकी अंर्तआत्मा ने उसे आईना दिखाया तब उसे अपनी एक-एक गलती, अपने बूढ़े माता-पिता का अकेलापन सब दिखने लगा। और फिर ये सपना।

अंशुमन सब्र नहीं रख सका और फूट-फूटकर रो पड़ा। उसके रोने की आवाज़ सुनकर रोजी ने चिढ़ते हुए कहा “क्यों इतनी रात में मेरी नींद खराब कर रहे हो? अभी-अभी आयी हूँ मैं। सोने दो मुझे।”

रोजी की बेरुखी भरी आवाज़ सुनकर अंशुमन चुपचाप कमरे से बाहर चला गया।

“अब रोने और पछताने से क्या फायदा? जो चले गए, ना वो लौटने वाले है ना उनकी उम्मीदें। लेकिन अभी भी ऐसा कुछ है जिसे तुम बचा सकते हो।” एक बार फिर अंशुमन की अंतरात्मा उसके सामने खड़ी थी।

अंशुमन ने हैरानी से पूछा “किसे बचा सकता हूँ मैं?”

“उसी को जिसे तुमने सपने में रोते हुए देखा, जिसे आज भी तुम्हारा इंतज़ार है, जो तुम्हें पुकार रही है, तुम्हारे पुरखों का उजाड़ पड़ा खेत, तुम्हारे वतन की मिट्टी।” अंशुमन की अंर्तआत्मा ने उससे कहा।

अंशुमन को ख्याल आया कि सोने में जो ज़मीन उसे दिखती है वो तो सचमुच उसके पिताजी का खेत है क्योंकि सपने में भी उसे खेत की मेड़ के पास का वो पुराना नीम का पेड़ दिखा था, जो सिर्फ उनकी ही मेड़ के पास था।

अगले ही पल अंशुमन निर्णय ले चुका था। वो अपने कमरे में गया और नोटपैड निकालकर रोजी के नाम एक चिट्ठी लिखी।

“रोजी, मेरी-तुम्हारी दुनिया हमेशा ही अलग थी। तुम अपने स्वार्थ के लिए मेरे साथ थी और मैं अपने स्वार्थ के लिए। तुम्हें और बच्चों को मुझसे जो चाहिए, कम्पनी का मालिकाना हक वो मैं तुम्हें देकर जा रहा हूँ वापस अपनी दुनिया में, अपने देश।”

अपनी कुछ निजी जमा-पूंजी लेकर अंशुमन भारत के लिए निकल गया।

दो दिनों की लंबी यात्रा के बाद वो आखिरकार अपने गांव पहुँच गया। वहां अब सब कुछ बदल चुका था। अधिकांश पुराने लोग शहर जाकर बस चुके थे। जब वो अपने घर की देहरी पर पहुँचा तो उसकी जीर्ण-शीर्ण दशा देखकर रो पड़ा। माँ का बनाया हुआ तुलसी-चौड़ा, जहां उसके पिता बैठा करते थे वो ओसारा, पीछे छोटे से बगीचे में जहां कभी नन्हा अंशुमन अपना पूरा दिन बिता देता था, घर के वो कमरे जहां ना जाने कितनी मधुर स्मृतियां बसी थी सब उजाड़ हो गया था। दरवाजा खोलकर जब वो अंदर गया तो अपने पिता की चारपाई पर नज़र पड़ते ही उस पर लेट गया। उस टूटी हुई चारपाई पर लेटकर आज उसे यूँ महसूस हो रहा था मानों वो अपने पिता की गोद में ही हो।

घर का दरवाजा खुला देख उसके पुराने पड़ोसी देबू काका अंदर आये जो अंशुमन के पिता की उम्र के ही थे। अंशुमन को देखते ही वो उसे पहचान गए और बोले “इतने सालों के बाद अचानक कैसे आना हुआ बेटे?”

उनके पांव छूते हुए अंशुमन एक बार फिर से रो पड़ा। उसके आँसू पोंछते हुए उन्होंने उसे ढांढस बंधाया।

कुछ देर के बाद खुद को संयत करते हुए अंशुमन ने कहा “बहुत देर हो गयी काका, लेकिन अब मैं हमेशा के लिए लौट आया हूँ। अब अंतिम साँस तक यहीं रहना है।”

“बहुत खुशी की बात है बेटे। तुम्हारे माता-पिता की आत्मा को आज सुकून मिला होगा तुम्हें यहां देखकर। लेकिन अभी ये घर रहने के लायक नहीं है। इसलिए तुम मेरे घर चलो। कल मिल-जुलकर इसे रहने लायक बनाने के बाद यहां आ जाना।” देबू काका बोले।

अंशुमन ने कहा “नहीं काका, मैं यहीं रहूंगा।”

“अच्छा ठीक है, पर चलकर मुँह-हाथ तो धो लो, कुछ खा लो फिर आ जाना”। अंशुमन का हाथ पकड़कर उसे उठाने का उपक्रम करते हुए देबू काका ने कहा।

अब अंशुमन मना नहीं कर सका और उनके साथ चला गया। रात का खाना खाकर जब वो लौटा तो अपने पुराने कमरे में चला गया। आज एक लंबे अरसे के बाद बिना गोलियां खाये उसे सुकून की नींद आयी।

सुबह होते ही मिस्त्री और मजदूरों को बुलवाकर अंशुमन ने घर की मरम्मत शुरू करवा दी। माली को बुलाकर बगीचे में नए पौधे लगवाए, माँ का तुलसी-चौरा भी पुनः जीवित किया।

कुछ ही दिनों में मरम्मत का सारा काम पूरा हो गया। अब ये घर फिर से वैसा ही लग रहा था, जैसा उसके माता-पिता उसे रखा करते थे।

उनकी बची हुई सारी निशानियों को अंशुमन ने बहुत प्यार से घर के हर कमरे में सजा दिया था।

अब उसे अपने खेत का ख्याल आया। कहीं किसी ने उन पर अवैध कब्जा तो नहीं कर लिया होगा, सोचता हुआ अंशुमन देबू काका के घर पहुँचा।

देबू काका ने कहा “बेफिक्र होकर अपने खेत पर जाओ बेटे। हमारे गांव के लोगों में हमेशा से ही किसी परिवार के जैसी एकता रही है। तुम्हारा खेत अब भी तुम्हारा है। उन पर किसी ने बुरी नज़र नहीं डाली है।”

जब अंशुमन अपने खेत पर पहुँचा तो उसकी दशा देखकर उसे सदमा सा लगा। जो ज़मीन हमेशा ही फसलों से लहलहाती रहती थी आज बंजर पड़ी थी। उसमें जगह-जगह दरारें आ चुकी थी। बिल्कुल वैसी जैसी वो सपने में देखा करता था।

“तुम्हारे पिता की मृत्यु के बाद अगर कोई इन पर खेती करता, तो हो सकता है कि कभी भविष्य में तुम या तुम्हारे बच्चे उस पर ज़मीन हड़पने का इल्जाम लगा देते, इसलिए किसी ने इसे हाथ नहीं लगाया।” गुमसुम से अंशुमन के कंधे पर हाथ रखते हुए देबू काका बोले।

अंशुमन सहमत था उनसे। हालांकि उसे खेती-बाड़ी की कोई खास जानकारी नहीं थी फिर भी उसने ठान लिया कि वो इस जमीन का दुख दूर करके ही रहेगा।

अगले दिन ही अंशुमन अपने जिले के ‘कृषि परामर्श संस्थान’ पहुँचा और वहां से अपने खेत के लिए सारी जरूरी जानकारियां ले आया। अब इस उम्र में अकेले इतनी मेहनत का काम करना सम्भव नहीं था इसलिए उसने कुछ मजदूर रख लिए और उनके साथ मिलकर अपने बंजर हो चुके खेत को फिर से नया जीवन देने में जुट गया।

खेत में खुद अपने हाथों से काम करते हुए उसे अभूतपूर्व सुख की अनुभूति होती थी।

आखिरकार अंशुमन की लगन रंग लाई आउट देखते-देखते वो खेत फसलों की हरियाली से खिल उठा।

गांव के सारे लोगों के लिए ये किसी चमत्कार से कम नहीं था। किसी को भी आशा नहीं थी कि अब इस खेत में कभी कुछ उपजेगा भी।

अंशुमन के लिए काम करने वाले मजदूर उसकी बहुत इज्ज़त करते थे। वो ना सिर्फ उन्हें उचित मेहनताना देता था, बल्कि हमेशा उनसे सम्मान से पेश आता था और मालिक ना समझकर खुद को उनका साथी मानकर उनके साथ काम में हाथ बंटाता था, साथ ही उनके दुख-सुख, उनकी समस्याओं में भी भागीदार बनता था जो कि उसने अमेरिका में रहकर कभी नहीं किया था। शायद उसमें आया ये बदलाव अपनी मिट्टी के असर से था।

गांव के भी तमाम लोग अंशुमन से जुड़ गए थे। अब वो उन सबका था और सब उसके।

अब फसल कटाई के दिन नज़दीक थे। अंशुमन के मजदूरों ने कहा “बाबू, आप आराम कीजिये हम ये काम कर लेंगे।” लेकिन अंशुमन ने इंकार कर दिया।

सर पर पगड़ी बांधे वो खेत के एक हिस्से में कटाई में लगा था

तभी टूटी-फूटी हिंदी में किसी की आवाज़ आयी “अंशुमन जी कहाँ रहते है?”

अंशुमन ने चौंककर देखा तो सामने उसके दोनों बेटे रॉबी एयर बॉबी खड़े थे। अंशुमन को देखते ही दोनों आगे बढ़कर उसके गले से लग गए और बोले “डैडी, हमें भी आपके साथ रहना है प्लीज।”

अंशुमन उन्हें लेकर घर पहुँचा और बोला “बेटा, तुम लोग यहां के माहौल में नहीं रह पाओगे। ये गांव तुम लोगों के एडवेंचरस ट्रिप का हिस्सा हो सकता है हमेशा के लिए तुम्हारे रहने की जगह नहीं।”

“हम आराम से और ख़ुशी से रह लेंगे डैडी, आप एक मौका तो दीजिये हमें।” रॉबी और बॉबी एक स्वर में बोले।

जब अंशुमन ने अचानक उनके यहां आने की वजह पूछी तो रॉबी ने बताया कि कुछ दिनों पहले उसका एक गम्भीर एक्सीडेंट हो गया था। वो पन्द्रह दिन अस्पताल में था। बस बॉबी ही था जो अकेले उसकी देखभाल करता था। ना उनकी माँ को अपनी दुनिया से फुर्सत थी, ना उन दोस्तों को जिन्हें वो अपना समझता था।

रोजी बस कुछ मिनटों के लिए आकर औपचारिकता निभा देती थी।

ऐसे में उन दोनों को बचपन के दिन याद आने लगे जब उनकी तबियत खराब होने पर अंशुमन रात-रात भर उनके सिरहाने बैठा रहता था, उनके लिए अपने हाथ से खाना बनाता था।

इसलिए उन दोनों ने तय कर लिया कि वो अपने डैडी के पास जाएंगे और वहां रहेंगे जहां कोई उनका अपना हो, कोई उनकी परवाह करने वाला हो।

“क्या तुमने अपनी माँ को बताया है कि तुम यहाँ आ रहे हो?” अंशुमन ने पूछा।

बॉबी ने कहा “हाँ डैडी, हमने बता दिया है और उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। उन्होंने कहा हम कहीं भी जाने के लिए आज़ाद है।”

अगली सुबह जब अंशुमन खेत में जाने के लिए निकला तो रॉबी और बॉबी बोले “डैडी, हम भी आपके साथ चलेंगे।”

वहां पहुँचकर जब उन दोनों ने फसलों से लहलहाते हुए खेत को देखा तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। इससे भी ज्यादा आश्चर्य उन्हें तब हुआ जब दोनों को पता चला कि उनके डैडी ने खुद खेत में काम करके ये फसल उगायी है।

उन्हें एक किनारे बैठाकर अंशुमन मजदूरों के साथ फिर से कटाई में जुट गया।

उसे काम करते हुए देखकर रॉबी और बॉबी बोले “डैडी, हम भी अपने खेत में काम करेंगे। हमें सिखाइये ना।”

अंशुमन पूरे उत्साह से उन्हें फसल काटने का तरीका सिखाने लगा। और जब दोनों ने पहली बार थोड़ी सी फसल काटी तब उनकी खुशी देखते ही बनते थी।

मंडी में अंशुमन को फसल के बहुत अच्छे दाम मिल गए। घर आकर रॉबी और बॉबी के साथ मिलकर उसने ये कमाई अपने माता-पिता की तस्वीर के आगे रख दी।

उनकी तस्वीर को देखकर यूँ लग रहा था मानों वो साक्षात सामने खड़े मुस्कुरा रहे है।

आज पहली बार अंशुमन की आँखों में खुशी के आँसू थे।

कुछ दिनों के आराम के बाद अंशुमन अपने बेटों के साथ फिर से खेत पहुँचा और खेत को अगली फसल के लिए तैयार करने में जुट गया।

उन तीनों को स्वेच्छा और खुशी से खेत में काम करते हुए देखकर गांव के उन लोगों को भी प्रेरणा मिल रही थी जो अब खेती को तुच्छ मानने लगे थे।

काम के साथ-साथ मिट्टी और पानी से खेलते हुए रॉबी और बॉबी मानों बच्चे बन गए थे और उन्हें यूँ देखकर अंशुमन का भी बचपन लौट आया था।

अपने खेत की मिट्टी को माथे से लगाते हुए अंशुमन ने कहा “माँ, तेरी वजह से आज मुझे मेरा परिवार मिला है। तूने मेरा खाली दामन खुशी से भर दिया। मैं कैसे आभार करूँ तेरा।”

ऐसा लगा जैसे खेत से आवाज़ आयी “बस इसी तरह मुझमें जीवन बनाये रखना बेटे, फिर से मुझे बंजर मत होने देना और मुझे कुछ नहीं चाहिए।”

“हाँ माँ, अब तेरा आँचल सदा हरियाली से सज़ा रहेगा।” अंशुमन ने अपनी मिट्टी से वादा किया।

तभी पानी की बौछार से उसका ध्यान टूटा। सामने रॉबी और बॉबी ट्यूबवेल की पाइप लिए खड़े उस पर पानी बरसाते हुए हँस रहे थे। उनकी तरफ बढ़ते हुए अंशुमन भी उनकी हँसी में शामिल हो गया था।

©शिखा श्रीवास्तव

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