राजा हरदौल की कहानी पार्ट 1 BY INDIAN PAPER INK

RAJA HARDOL

बुंदेलखंड में ओरछा पुराना राज्य है। इसके राजा बुंदेले हैं। इन बुंदेलों ने पहाड़ों की घाटियों में अपना जीवन बिताया है।

एक समय ओरछे के राजा जुझारसिंह थे। ये बड़े साहसी और बुद्धिमान थे।

शाहजहाँ उस समय दिल्ली के बादशाह थे।

जब शाहजहाँ लोदी ने बलवा किया और वह शाही मुल्क को लूटता-पाटता ओरछे की ओर आ निकला, तब राजा जुझारसिंह ने उससे मोरचा लिया।

 राजा के इस काम से गुणग्राही शाहजहाँ बहुत प्रसन्न हुए।

 उन्होंने तुरंत ही राजा को दक्खिन का शासन-भार सौंपा।

 उस दिन ओरछे में बड़ा आनंद मनाया गया।

 शाही दूत खिलअत और सनद ले कर राजा के पास आया।

 जुझारसिंह को बड़े-बड़े काम करने का अवसर मिला।

सफ़र की तैयारियाँ होने लगीं, तब राजा ने अपने छोटे भाई हरदौलसिंह को बुला कर कहा,

“भैया, मैं तो जाता हूँ। अब यह राज-पाट तुम्हारे सुपुर्द है। तुम भी इसे जी से प्यार करना! न्याय ही राजा का सबसे बड़ा सहायक है। न्याय की गढ़ी में कोई शत्रु नहीं घुस सकता, चाहे वह रावण की सेना या इंद्र का बल लेकर आए, पर न्याय वही सच्चा है, जिसे प्रजा भी न्याय समझे। तुम्हारा काम केवल न्याय ही करना न होगा, बल्कि प्रजा को अपने न्याय का विश्वास भी दिलाना होगा और मैं तुम्हें क्या समझाऊँ, तुम स्वयं समझदार हो।”

यह कह कर उन्होंने अपनी पगड़ी उतारी और हरदौलसिंह के सिर पर रख दीं।

 हरदौल रोता हुआ उनके पैरों से लिपट गया। इसके बाद राजा अपनी रानी से विदा होने के लिए रनिवास आए।

 रानी दरवाज़े पर खड़ी रो रही थी। उन्हें देखते ही पैरों पर पड़ी।

 जुझारसिंह ने उठा कर उसे छाती से लगाया और कहा, “प्यारी, यह रोने का समय नहीं है।

 बुंदेलों की स्त्रियाँ ऐसे अवसर पर रोया नहीं करतीं।

 ईश्वर ने चाहा, तो हम-तुम जल्द मिलेंगे। मुझ पर ऐसी ही प्रीति रखना। 

राजा हरदौल की कहानी

मैंने राज-पाट हरदौल को सौंपा है, वह अभी लड़का है। उसने अभी दुनिया नहीं देखी है।

 अपनी सलाहों से उसकी मदद करती रहना।”

रानी की ज़बान बंद हो गई। वह अपने मन में कहने लगी, “हाय यह कहते हैं, बुंदेलों की स्त्रियाँ ऐसे अवसरों पर रोया नहीं करतीं।

 शायद उनके हृदय नहीं होता, या अगर होता है तो उसमें प्रेम नहीं होता!” रानी कलेजे पर पत्थर रख कर आँसू पी गई और हाथ जोड़ कर राजा की ओर मुस्कराती हुई देखने लगी; पर क्या वह मुस्कराहट थी।

 जिस तरह अंधेरे मैदान में मशाल की रोशनी अंधेरे को और भी अथाह कर देती है, उसी तरह रानी की मुस्कराहट उसके मन के अथाह दुख को और भी प्रकट कर रही थी।

जुझारसिंह के चले जाने के बाद हरदौलसिंह राज करने लगा।

 थोड़े ही दिनों में उसके न्याय और प्रजावात्सल्य ने प्रजा का मन हर लिया। लोग जुझारसिंह को भूल गए।

 जुझारसिंह के शत्रु भी थे और मित्र भी; पर हरदौलसिंह का कोई शत्रु न था, सब मित्र ही थे।

 वह ऐसा हँसमुख और मधुर भाषी था कि उससे जो बातें कर लेता, वही जीवन भर उसका भक्त बना रहता।

 राज भर में ऐसा कोई न था जो उसके पास तक न पहुँच सकता हो। रात-दिन उसके दरबार का फाटक सबके लिए खुला रहता था। 

ओरछे को कभी ऐसा सर्वप्रिय राजा नसीब न हुआ था। 

वह उदार था, न्यासी था, विद्या और गुण का ग्राहक था, पर सबसे बड़ा गुण जो उसमें था, वह उसकी वीरता थी।

 उसका वह गुण हद दर्जे को पहुँच गया था। जिस जाति के जीवन का अवलंब तलवार पर है, वह अपने राजा के किसी गुण पर इतना नहीं रीझती जितना उसकी वीरता पर।

राजा हरदौल की कहानी

 हरदौल अपने गुणों से अपनी प्रजा के मन का भी राजा हो गया, जो मुल्क और माल पर राज करने से भी कठिन है।

 इस प्रकार एक वर्ष बीत गया।

 उधर दक्खिन में जुझारसिंह ने अपने प्रबंध से चारों ओर शाही दबदबा जमा दिया, इधर ओरछे में हरदौल ने प्रजा पर मोहन-मंत्र फूँक दिया।

..

फाल्गुन का महीना था, अबीर और गुलाल से ज़मीन लाल हो रही थी।

 कामदेव का प्रभाव लोगों को भड़का रहा था।

रबी ने खेतों में सुनहला फ़र्श बिछा रखा था और खलिहानों में सुनहले महल उठा दिए थे।

 संतोष इस सुनहले फ़र्श पर इठलाता फिरता था और निश्चिंतता उस सुनहले महल में ताने आलाप रही थी।

 इन्हीं दिनों दिल्ली का नामवर फेकैती कादिर खाँ ओरछे आया। बड़े-बड़े पहलवान उसका लोहा मान गए थे।

 दिल्ली से ओरछे तक सैंकड़ों मर्दानगी के मद से मतवाले उसके सामने आए, पर कोई उससे जीत न सका।

 उससे लड़ना भाग्य से नहीं, बल्कि मौत से लड़ना था।

 वह किसी इनाम का भूखा न था। जैसा ही दिल का दिलेर था, वैसा ही मन का राजा था।

 ठीक होली के दिन उसने धूम-धाम से ओरछे में सूचना दी कि “खुदा का शेर दिल्ली का कादिर खाँ ओरछे आ पहुँचा है।

 जिसे अपनी जान भारी हो, आ कर अपने भाग्य का निपटारा कर ले।” ओरछे के बड़े-बड़े बुंदेले सूरमा वह घमंड-भरी वाणी सुन कर गरम हो उठे।

 फाग और डफ की तान के बदले ढोल की वीर-ध्वनि सुनाई देने लगी।

हरदौल का अखाड़ा ओरछे के पहलवानों और फेकैतों का सबसे बड़ा अड्डा था।

 संध्या को यहाँ सारे शहर के सूरमा जमा हुए।

 कालदेव और भालदेव बुंदेलों की नाक थे, सैंकड़ों मैदान मारे हुए।

 ये ही दोनों पहलवान कादिर खाँ का घमंड चूर करने के लिए गए।

राजा हरदौल की कहानी

दूसरे दिन क़िले के सामने तालाब के किनारे बड़े मैदान में ओरछे के छोटे-बड़े सभी जमा हुए।

 कैसे-कैसे सजीले, अलबेले जवान थे, सिर पर खुशरंग बांकी पगड़ी, माथे पर चंदन का तिलक, आँखों में मर्दानगी का सरूर, कमर में तलवार।

 और कैसे-कैसे बूढ़े थे, तनी हुईं मूँछें, सादी पर तिरछी पगड़ी, कानों में बँधी हुई दाढ़ियाँ, देखने में तो बूढ़े, पर काम में जवान, किसी को कुछ न समझने वाले।

 उनकी मर्दाना चाल-ढाल नौजवानों को लजाती थी।

 हर एक के मुँह से वीरता की बातें निकल रही थीं।

 नौजवान कहते थे, “देखें आज ओरछे की लाज रहती है या नहीं।

 पर बूढ़े कहते- ओरछे की हार कभी नहीं हुई, न होगी।

 वीरों का यह जोश देख कर राजा हरदौल ने बड़े ज़ोर से कह दिया, “खबरदार, बुंदेलों की लाज रहे या न रहे; पर उनकी प्रतिष्ठा में बल न पड़ने पाए- यदि किसी ने औरों को यह कहने का अवसर दिया कि ओरछे वाले तलवार से न जीत सके तो धांधली कर बैठे, वह अपने को जाति का शत्रु समझे।”

सूर्य निकल आया था। एकाएक नगाड़े पर चोट पड़ी और आशा तथा भय ने लोगों के मन को उछाल कर मुँह तक पहुँचा दिया।

 कालदेव और कादिर खाँ दोनों लँगोट कसे शेरों की तरह अखाड़े में उतरे और गले मिल गए।

 तब दोनों तरफ़ से तलवारें निकलीं और दोनों के बगलों में चली गईं।

 फिर बादल के दो टुकड़ों से बिजलियाँ निकलने लगीं।

 पूरे तीन घंटे तक यही मालूम होता रहा कि दो अंगारे हैं।

 हज़ारों आदमी खड़े तमाशा देख रहे थे और मैदान में आधी रात का-सा सन्नाटा छाया था। 

हाँ, जब कभी कालदेव गिरहदार हाथ चलाता या कोई पेंचदार वार बचा जाता, तो लोगों की गर्दन आप ही आप उठ जाती; पर किसी के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकलता था।

राजा हरदौल की कहानी

 अखाड़े के अंदर तलवारों की खींचतान थी; पर देखनेवालों के लिए अखाड़े से बाहर मैदान में इससे भी बढ़ कर तमाशा था। बार-बार जातीय प्रतिष्ठा के विचार से मन के भावों को रोकना और प्रसन्नता या दु:ख का शब्द मुँह से बाहर न निकलने देना तलवारों के वार बचाने से अधिक कठिन काम था।

 एकाएक कादिर खाँ ‘अल्लाहो-अकबर’ चिल्लाया, मानो बादल गरज उठा और उसके गरजते ही कालदेव के सिर पर बिजली गिर पड़ी।

कालदेव के गिरते ही बुंदेलों को सब्र न रहा। 

हर एक के चेहरे पर निर्बल क्रोध और कुचले हुए घमंड की तस्वीर खिंच गई।

 हज़ारों आदमी जोश में आ कर अखाड़े पर दौड़े, पर हरदौल ने कहा, “खबरदार! अब कोई आगे न बढ़े।” इस आवाज़ ने पैरों के साथ जंजीर का काम किया।

 दर्शकों को रोक कर जब वे अखाड़े में गए और कालदेव को देखा, तो आँखों में आँसू भर आए।

 जख्मी शेर ज़मीन पर पड़ा तड़प रहा था। उसके जीवन की तरह उसकी तलवार के दो टुकड़े हो गए थे।

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