रानी केतकी की कहानी भाग चतुर्थ – इंशाअल्ला खाँ

रानी केतकी का भभूत लगाकर बाहर निकल जाना

और सब छोटे बड़ों का तिलमिलाना दस पन्द्रह दिन पीछे एक दिन रानी केतकी बिन कहे मदनबान के वह भभूत आँखों में लगा के घर से बाहर निकल गई।

कुछ कहने में आता नहीं, जो माँ बाप पर हुई। सब ने यह बात ठहराई, गुरूजी ने कुछ समझकर रानी केतकी को अपने पास बुला लिया होगा।

महाराज जगतपरकास और महारानी कामलता राजपाट उस वियोग में छोड़ छाड़ के पहाड़ को चोटी पर जा बैठे और किसी को अपने आँखों में से राज थामने को छोड़ गए।

बहुत दिनों पीछे एक दिन महारानी ने महाराज जगतपरकास से कहा – “रानी केतकी का कुछ भेद जानती होगी तो मदनबान जानती होगी।

उसे बुलाकर तो पँूछो।” महाराज ने उसे बुलाकर पूछा तो मदनबान ने सब बातें खोलियाँ।

रानी केतकी के माँ बाप ने कहा – “अरी मदनबान, जो तू भी उसके साथ होती तो हमारा जी भरता।

अब तो वह तुझे ले जाये तो कुछ हचर पचर न कीजियो, उसको साथ ही लीजियो।

जितना भभूत है, तू अपने पास रख।

हम कहाँ इस राख को चूल्हें में डालेंगे।

गुरूजी ने तो दोनों राज का खोज खोया – कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप दोनों अलग हो रहे।

जगतपरकास और कामलता को यों तलपट किया।

भभूत न होती तो ये बातें काहे को सामने आती” ।

मदनबान भी उनके ढूँढने को निकली। अंजन लगाए हुए रानी केतकी रानी केतकी कहती हुई पड़ी फिरती थी।

बहुत दिनों पीछे कहीं रानी केतकी भी हिरनों की दहाड़ों में उदैभान उदैभान चिघाड़ती हुई आ निकली।

एक ने एक को ताड़कर पुकारा – “अपनी तनी आँखें धो डालो।

” एक डबरे पर बैठकर दोनों की मुठभेड़ हुई।

गले लग के ऐसी रोइयाँ जो पहाड़ों में कूक सी पड़ गई।

दोहरा

छा गई ठंडी साँस झाड़ों में।

पड़ गई कूक सी पहाड़ों में।

इंशाअल्ला खाँ

दोनों जनियाँ एक अच्छी सी छाँव को ताड़कर आ बैठियाँ और अपनी अपनी दोहराने लगीं।

बातचीत रानी केतकी की मदनबान के साथ

रानी केतकी ने अपनी बीती सब कही और मदनबान वही अगला झींकना झीका की और उनके माँ-बाप ने जो उनके लिये जोग साधा था, जो वियोग लिया था, सब कहा।

जब यह सब कुछ हो चुकी, तब फिर हँसने लगी।

रानी केतकी उसके हंसने पर रूककर कहने लगी –

दोहरा

हम नहीं हँसने से रूकते, जिसका जी चाहे हँसे।

है वही अपनी कहावत आ फँसे जी आ फँसे।।

अब तो सारा अपने पीछे झगड़ा झाँटा लग गया।

पाँव का क्या ढूँढती हा जी में काँटा लग गया।।

पर मदनबान से कुछ रानी केतकी के आँसू पुँछते चले। उन्ने यह बात कही – “जो तुम कहीं ठहरो तो मैं तुम्हारे उन उज़ड़े हुए माँ-बाप को ले आऊँ और उन्हीं से इस बात को ठहराऊँ। गोसाई महेंदर गिर जिसकी यह सब करतूत है, वह भी इन्हीं दोनों उजड़े हुओं की मुठ्ठी में हैं। अब भी जो मेरा कहा तुम्हारे ध्यान चढ़ें, तो गए हुए दिन फिर सकते हैं। पर तुम्हारे कुछ भावे नहीं, हम क्या पड़ी बकती है। मैं इसपर बीड़ा उठाती हूँ”।

बहुत दिनों पीछे रानी केतकी ने इसपर ‘अच्छा’ कहा और मदनबान को अपने माँ-बाप के पास भेजा और चिठ्ठी अपने हाथों से लिख भेजी जो आपसे हो सके तो उस जोगी से ठहरा के आवें।

इंशाअल्ला खाँ

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