रानी केतकी की कहानी भाग तृतीय – इंशाअल्ला खाँ

रानी केतकी का चाहत से बेकल होना और मदनवान का साथ देने से नाहीं करना और लेना उसी भभूत का, जो गुरूजी दे गए थे, आँख-मिचौबल के बहाने अपनी माँ रानी कामलता से।

एक रात रानी केतकी ने अपनी माँ रानी कामलता को भुलावे में डालकर यों कहा और पूछा – “गुरूजी गुसाई महेंदर गिर ने जो भभूत मेरे बाप को दिया है, वह कहाँ रक्खा है और उससे क्या होता है?”

रानी कामलता बोल उठी – आँख-मिचौवल खेलने के लिये चाहती हूँ।

जब अपनी सहेलियों के साथ खेलूँ और चोर बनूँ तो मुझको कोई पकड़ न सके।”

महारानी ने कहा – “वह खेलने के लिये नहीं हैं।

ऐसे लटके किसी बुरे दिन के सँभालने को डाल रखते हैं।

क्या जाने कोई घड़ी कैसी है, कैसी नहीं।

” रानी केतकी अपनी माँ की इस बात पर अपना मुँह थुथा कर उठ गई और दिन भर खाना न खाया।

महाराज ने जो बुलाया तो कहा मुझे रूच नहीं।

तब रानी कामलता बोल उठीं- “अजी तुमने सुना भी, बेटी तुम्हारी आँख मिचौवल खेलने क लिये वह भभूत गुरूजी का दिया माँगती थी।

मैंने न दिया और कहा, लड़की यह लड़कपन की बातें अच्छी नहीं।

किसी बुरे दिन के लिये गुरूजी गए हैं।

इसी पर मुझ से रूठी है।

बहुतेरा बहलाती हूँ, मानती नहीं।”

महाराज ने कहा – “भभूत तो क्या, मुझे अपना जी भी उससे प्यारा नहीं।

मुझे उसके एक पहर के बहल जाने पर एक जी तो क्या, जो करोर जी हों तो दे डालें।”

रानी केतकी को डिबिया में से थोड़ा सा भभूत दिया।

कई दिन तलक आँख मिचौवल अपने माँ-बाप के सामने सहेलियों के साथ खेलती सबको हँसाती रही, जो सौ सौ थाल मोतियों के निछावर हुआ किए, क्या कहूँ, एक चुहल थी जो कहिए तो करोड़ों पोथियों में ज्यों की त्यों न आ सके।

इंशाअल्ला खाँ की कहानी

रानी केतकी का चाहत से बेकल होना और मदन बान का साथ देने से नहीं करना

एक रात रानी केतकी उसी ध्यान में मदनबान से यों बोल उठी – “अब मैं निगोडी लाज से कुट करती हूँ, तू मेरा साथ दे।” मदनबान ने कहा – क्यों कर? रानी केतकी ने वह भभूत का लेना उसे बताया और यह सुनाया –

“यह सब आँख-मिचौवल के झाई झप्पे मैंने इसी दिन के लिये कर रक्खे थे।”

मदनबान बोली – “मेरा कलेजा थरथराने लगा।

अरी यह माना जो तुम अपनी आँखों में उस भभूत का अंजन कर लोगी

और मेरे भी लगा दोगी तो हमें तुम्हें कोई न देखेगा।

और हम तुम सब को देखेंगी। पर ऐसी हम कहाँ जी चली हैं।

जो बिन साथ, जोबन लिए, बन-बन में पड़ी भटका करें

और हिरनों की सींगों पर दोनों हाथ डालकर लटका करें, और जिसके लिए यह सब कुछ है, सो वह कहाँ?

और होय तो क्या जाने जो यह रानी केतकी है और यह मदनबान निगोड़ी नोची खसोटी उजड़ी उनकी सहेली है।

चूल्हे और भाड़ में जाय यह चाहत जिसके लिए आपकी माँ-बाप का राज-पाट सुख नींद लाज छोड़कर नदियों के कछारों में फिरना पड़े, सो भी बेडौल।

जो वह अपने रूप में होते तो भला थोड़ा बहुत आसरा था।

ना जी यह तो हमसे न हो सकेगा।

जो महाराज जगतपरकास और महारानी कामलता का हम जान-बूझकर घर उजाड़ें और इनकी जो इकलौती लाडली बेटी है, उसको भगा ले जायें और जहाँ तहाँ उसे भटकावें और बनासपत्ति खिलावें और अपने घोड़ें को हिलावें।

इंशाअल्ला खाँ की कहानी

जब तुम्हारे और उसके माँ बाप में लड़ाई हो रही थी और उनने उस मालिन के हाथ तुम्हें लिख भेजा था जो मुझे अपने पास बुला लो, महाराजों को आपस में लड़ने दो, जो होनी हो सो हो; हम तुम मिलके किसी देश को निकल चलें; उस दिन न समझीं। तब तो वह ताव भाव दिखाया।

अब जो वह कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप तीनों जी हिरनी हिरन बन गए।

क्या जाने किधर होंगे।

उनके ध्यान पर इतनी कर बैठिए जो किसी ने तुम्हारे घराने में न की, अच्छी नहीं।

इस बात पर पानी डाल दो; नहीं तो बहुत पछताओगी और अपना किया पाओगी।

मुझसे कुछ न हो सकेगा। तुम्हारी जो कुछ अच्छी बात होती, तो मेरे मुँह से जीते जी न निकलता।

पर यह बात मेरे पेट में नहीं पच सकती।

तुम अभी अल्हड़ हो। तुमने अभी कुछ देखा नहीं।

जो ऐसी बात पर सचमुच ढलाव देखूँगी तो तुम्हारे बाप से कहकर यह भभूत जो बह गया निगोड़ा भूत मुछंदर का पूत अवधूत दे गया है, हाथ मुरकवाकर छिनवा लूँगी।”

रानी केतकी ने यह रूखाइयाँ मदनबान की सुनकर हँसकर टाल दिया और कहा – “जिसका जी हाथ में न हो, उसे ऐसी लाखों सूझती है; पर कहने और करने में बहुत सा फेर है।

भला यह कोई अँधेर है जो माँ बाप, रावपाट, लाज छोड़कर हिरन के पीछे दौड़ती करछालें मारती फिरूँ।

पर अरी तू तो बड़ी बावली चिड़िया है जो यह बात सच जानी और मुझसे लड़ने लगी।”

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