रानी केतकी की कहानी भाग द्वितीय

सराहना जोगी जी के स्थान का

कैलास पहाड़ जो एक डौल चाँदी का है, उस पर राजा जगतपरकास का गुरू, जिसको महेंदर गिर सब इंदरलोक के लोग कहते थे, ध्यान ज्ञान में कोई ९० लाख अतीतों के साथ ठाकुर के भजन में दिन रात लगा रहता था। सोना, रूपा, ताँबे, राँगे का बनाना तो क्या और गुटका मुँह में लेकर उड़ना परे रहे, उसको और बातें इस इस ढब की ध्यान में थीं जो कहने सुनने से बाहर हैं। मेंह सोने रूपे का बरसा देना और जिस रूप में चाहना हो जाना, सब कुछ उसके आगे खेल था। गाने बजाने में महादेव जी छूट सब उसके आगे कान पकड़ते थे। सरस्वती जिसकी सब लोग कहते थे, उनने भी कुछ कुछ गुनगुनाना उसी से सीखा था।

उसके सामने छ: राग छत्तीस रागिनियाँ आठ पहर रूप बँदियों का सा धरे हुए उसकी सेवा में सदा हाथ जोड़े खड़ी रहती थीं।

और वहाँ अतीतों को गिर कहकर पुकारते थे – भैरोगिर, विभासगिर, हिंडोलगिर, मेघनाथ, केदारनाथ, दीपकसेन, जोतिसरूप सारंगरूप।

और अतीतिनें उस ढब से कहलाती थीं – गुजरी, टोड़ी, असावरी, गौरी, मालसिरी, बिलावली।

जब चाहता, अधर में सिधासन पर बैठकर उड़ाए फिरता था और नब्बें लाख अतीत गुटके अपने मुँह में लिए, गेरूए वस्तर पहने, जटा बिखेरे उसके साथ होते थे।

जिस घड़ी रानी केतकी के बाप की चिठ्ठी एक बगला उसके घर पहुँचा देता है, गुरू महेंदर गिर एक चिग्घाड़ मारकर दल बादलों को ढलका देता है।

बघंबर पर बैठे भभूत अपने मुँह से मल कुछ कुछ पढंत़ करता हुआ बाव के घोड़े भी पीठ लगा और सब अतीत मृगछालों पर बैठे हुए गुटके मुँह में लिए हुए बोल उठे – गोरख जागा और मुंछदर भागा।

एक आँख की झपक में वहाँ आ पहुँचता है जहाँ दोनों महाराजों में लड़ाई हो रही थी।

पहले तो एक काली आँधी आई; फिर ओले बरसे; फिर टिड्डी आई।

किसी को अपनी सुध न रही।

रानी केतकी की कहानी

राजा सूरजभान के जितने हाथी घोड़े और जितने लोग और भीड़ भाड़ थी, कुछ न समझा कि क्या किधर गई और उन्हें कौन उठा ले गया।

राजा जगत परकास के लोगों पर और रानी केतकी के लोगों पर क्योड़े की बँूदों की नन्हीं-नन्हीं फुहार सी पड़ने लगी।

जब यह सब कुछ हो चुका, तो गुरूजी ने अतीतियों से कहा – “उदैभान, सूरजभान, लछमीबास इन तीनों को हिरनी हिरन बना के किसी बन में छोड़ दो; और जो उनके साथी हों, उन सभों को तोड़ फोड़ दो।”

जैसा गुरूजी ने कहा, झटपट वही किया।

विपत का मारा कुँवर उदैभान और उसका बाप वह राजा सूरजभान और उसकी माँ लछमीबास हिरन हिरनी वन गए।

हरी घास कई बरस तक चरते रहे; और उस भीड़ भाड़ का तो कुछ थल बेड़ा न मिला, किधर गए और कहाँ थे बस यहाँ की यहीं रहने दो।

फिर सुनो। अब रानी केतकी के बाप महाराजा जगतपरकास की सुनिए।

उनके घर का घर गुरूजी के पाँव पर गिरा और सबने सिर झुकाकर कहा – “महाराज, यह आपने बड़ा काम किया।

हम सबको रख लिया।

जो आज आप न पहुँचते तो क्या रहा था।

सब ने मर मिटने की ठान ली थी।

इन पापियों से कुछ न चलेगी, यह जानते थे।

राज पाट हमारा अब निछावर करके जिसको चाहिए, दे डालिए; राज हम से नहीं थम सकता।

सूरजभान के हाथ से आपने बचाया।

अब कोई उनका चचा चंद्रभान चढ़ आवेगा तो क्योंकर बचना होगा? अपने आप में तो सकत नहीं।

फिर ऐसे राज का फिट्टे मुँह कहाँ तक आपको सताया करें।

” जोगी महेंदर गिर ने यह सुनकर कहा – “तुम हमारे बेटा बेटी हो, अनंदे करो, दनदनाओ, सुख चैन से रहों।

अब वह कौन है जो तुम्हें आँख भरकर और ढब से देख सके।

वह बघंबर और यह भभूत हमने तुमको दिया।

रानी केतकी की कहानी

जो कुछ ऐसी गाढ़ पड़े तो इसमें से एक रोंगटा तोड़ आग में फूंक दीजियो।

वह रोंगटा फुकने न पावेगा जो बात की बात में हम आ पहुँचेंगे।

रहा भभूत, सो इसलिये है जो कोई इसे अंजन करै, वह सबको देखै और उसे कोई न देखै, जो चाहै सो करै।”

जाना गुरूजी का राजा के घर

गुरू महेंदर गिर के पाँव पूजे और धनधन महाराज कहे।

उनसे तो कुछ छिपाव न था।

महाराज जगतपरकास उनको मुर्छल करते हुए अपनी रानियों के पास ले गए।

सोने रूपे के फूल गोद भर-भर सबने निछावर किए और माथे रगड़े।

उन्होंने सबकी पीठें ठोंकी।

रानी केतकी ने भी गुरूजी को दंडवत की; पर जी में बहुत सी गुरू जी को गालियाँ दी।

गुरूजी सात दिन सात रात यहाँ रह कर जगतपरकास को सिंघासन पर बैठाकर अपने बघंबर पर बैठ उसी डौल से कैलाश पर आ धमके और राजा जगतपरकास अपने अगले ढब से राज करने लगा।

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