रानी केतकी की कहानी भाग पंचम – इंशाअल्ला खाँ

मदनबान का महाराज और महारानी के पास फिर आना और चितचाही बात सुनना

मदनबान रानी केतकी को अकेला छोड़कर राजा जगतपरकास और रानी कामलता जिस पहाड़ पर बैठी थीं,

झट से आदेश करके आ खड़ी हुई और कहने लगी – “लीजे आप राज कीजे,

आपके घर नए सिर से बसा और अच्छे दिन आये।

रानी केतकी का एक बाल भी बाँका नहीं हुआ।

उन्हीं के हाथों की लिखी चिठ्ठी लाई हूँ, आप पढ़ लीजिए।

आगे जो जी चाहे सो कीजिए।’

महाराज ने उस बधंबर में से एक रोंगटा तोड़कर आग पर रख के फूँक दिया।

बात की बात में गोसाई महेंदर गिर आ पहुँचा और जो कुछ नया सर्वांग जोगी-जागिन का आया,

आँखों देखा; सबको छाती लगाया और कहा – “बधंबर इसी लिये तो मैं सौंप गया था कि जो तुम पर कुछ हो तो इसका एक बाल फूँक दीजियो।

तुम्हारी यह गत हो गई। अब तक क्या कर रहे थे और किन नींदों में सोते थे?

पर तुम क्या करो यह खिलाड़ी जो रूप चाहे सौ दिखावे, जो नाच चाहे सौ नचावे।

भभूत लड़की को क्या देना था।

हिरनी हिरन उदैभान और सूरजभान उसके बाप और लछमीबास उनकी माँ को मैंने किया था।

फिर उन तीनों को जैसा का तैसा करना कोई बड़ी बात न थी।

अच्छा, हुई सो हुई। अब उठ चलो, अपने राज पर विराजो और ब्याह को ठाट करो।

अब तुम अपनी बेटी को समेटो, कुँवर उदैभान को मैंने अपना बेटा किया और उसको लेके मैं ब्याहने चढूँगा।”

महाराज यह सुनते ही अपनी गद्दी पर आ बैठे और उसी घड़ी यह कह दिया “सारी छतों और कोठों को गोटे से मढ़ो और सोने और रूपे के सुनहरे रूपहरे सेहरे सब झाड़ पहाड़ों पर बाँध दो और पेड़ों में मोती की लड़ियाँ बाँध दो और कह दो,

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चालीस दिन रात तक जिस घर में नाच आठ पहर न रहेगा, उस घर वाले से मैं रूठ रहूँगा,

और छ: महिने कोई चलनेवाला कहीं न ठहरे।

रात दिन चला जावे।” इस हेर फेर में वह राज था। सब कहीं यही डौल था।

जाना महाराज, महारानी और गुसाई महेंदर गिर का रानी केतकी के लिये फिर महाराज और महारानी और महेंदर गिर मदनबान के साथ जहाँ रानी केतकी चुपचाप सुन खींचे हुए बैठी हुई थी, चुप चुपाते वहाँ आन पहुँचे।

गुरूजी ने रानी केतकी को अपने गोद में लेकर कुँवर उदैभान का चढ़ावा दिया और कहा – तुम अपने माँ-बाप के साथ अपने घर सिधारो।

अब मैं बेटे उदैभान को लिये हुये आता हूँ।”

गुरूजी गोसाई जिनको दंडित है, सो तो वह सिधारते हैं।

आगे जो होगी सो कहने में आवेंगी – यहाँ पर धूम धाम और फैलावा अब ध्यान कीजिये।

महाराज जगतपरकास ने अपने सारे देश में कह दिया – “यह पुकार दे जो यह न करेगा उसकी बुरी गत होवेगी।

गाँव गाँव में अपने सामने छिपोले बना बना के सूहे कपड़े उनपर लगा के मोट धनुष की और गोखरू,

रूपहले सुनहरे की किरनें और डाँक टाँक टाँक रक्खो और जितने बड़ पीपल नए पुराने जहाँ जहाँ पर हों,

उनके फूल के सेहरे बड़े बड़े ऐसे जिसमें सिर से लगा पैर तलक पहुँचे, बाँधो।

चौतुक्का

पौदों ने रंगा के सूहे जोड़े पहने। सब पाँव में डालियों ने तोड़े पहने।।

बूटे बूटे ने फूल फूल के गहने पहने। जो बहुत न थे तो थोड़े थोड़े पहने।।

जितने डहडहे और हरियावल फल पात थे,

सब ने अपने हाथ में चहचही मेहंदी की रचावट के साथ जितनी सजावट में समा सके,

कर लिये और जहाँ जहाँ नयी ब्याही दुलहिनें नन्हीं नन्हीं फलियों की और सुहागिनें नई नई कलियों के जोड़े पंखुड़ियों के पहने हुए थीं।

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सब ने अपनी गोद सुहाय और प्यार के फूल और फलों से भरी और तीन बरस का पैसा सारे उस राजा के राज भर में जो लोग दिया करते थे,

जिस ढब से हो सकता था खेती बारी करके,

हल जोत के और कपड़ा लत्ता बेंचकर सो सब उनको छोड़ दिया और कहा जो अपने अपने घरों में बनाव की ठाट करें।

और जितने राज भर में कुएँ थे, खँड़सालों की खँडसालें उनमें उड़ेल गई और सारे बनों और पहाड़ तनियाँ में लाल पटों की झमझमाहट रातों को दिखाई देने लगी।

और जितनी झीलें थीं उनमें कुसुम और टेसू और हरसिंगार पड़ गया और केसर भी थोड़ी थोड़ी घोले में आ गई।

फुनगे से लगा जड तलक जितने झाड़ झंखाड़ों में पत्ते और पत्ती बँधी थीं, उनपर रूपहरी सुनहरी डाँक गोंद लगाकर चिपका दिया और सबों को कह दिया जो सही पगड़ी और बागे बिन कोई किसी डौल किसी रूप से फिर चले नहीं।

और जितने गवैये, बजवैए, भांड-भगतिए रहस धारी और संगीत पर नाचनेवाले थे, सबको कह दिया जिस जिस गाँव में जहाँ जहाँ हों अपनी अपनी ठिकानों से निकलकर अच्छे अच्छे बिछौने बिछाकर गाते-नाचते धूम मचाते कूदते रहा करें।

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