रानी केतकी की कहानी भाग प्रथम

कहानी के जीवन का उभार और बोलचाल की दुलहिन का सिंगार

किसी देश में किसी राजा के घर एक बेटा था। उसे उसके माँ-बाप और सब घर के लोग कुँवर उदैभान करके पुकारते थे।

सचमुच उसके जीवन की जोत में सूरज की एक स्रोत आ मिली थी।

उसका अच्छापन और भला लगना कुछ ऐसा न था जो किसी के लिखने और कहने में आ सके।

पंद्रह बरस भरके उसने सोलहवें में पाँव रक्खा था।

कुछ यों ही सी मसें भीनती चली थीं।

पर किसी बात के सोच का घर-घाट न पाया था और चाह की नदी का पाट उसने देखा न था।

एक दिन हरियाली देखने को अपने घोड़े पर चढ़के अठखेल और अल्हड़पन के साथ देखता भालता चला जाता था।

इतने में जो एक हिरनी उसके सामने आई, तो उसका जी लोट पोट हुआ।

उस हिरनी के पीछे सब छोड़ छाड़कर घोड़ा फेंका।

कोई घोड़ा उसको पा सकता था? जब सूरज छिप गया और हिरनी आँखों से ओझल हुई, तब तो कुँवर उदैभान भूखा, प्यासा, उनींदा, जँभाइयाँ, अँगड़ाइयाँ लेता, हक्का बक्का होके लगा आसरा ढूँढने।

इतने में कुछ एक अमराइयाँ देख पड़ी, तो उधर चल निकला; तो देखता है वो चालीस-पचास रंडियाँ एक से एक जोबन में अगली झूला डाले पड़ी झूल रही है और सावन गातियाँ हैं।

ज्यों ही उन्होंने उसको देखा – तू कौन? तू कौन? की चिंघाड़ सी पड़ गई। उन सभों में एक के साथ उसकी आँख लग गई।

कोई कहती थी यह उचक्का है।

कोई कहती थी एक पक्का है।

वही झूलेवाली लाल जोड़ा पहने हुए, जिसको सब रानी केतकी कहते थीं, उसके भी जी में उसकी चाह ने घर किया। पर कहने-सुनने को बहुत सी नाँह-नूह की और कहा –

“इस लग चलने को भला क्या कहते हैं! हक न धक, जो तुम झट से टहक पड़े।

यह न जाना, यह रंडियाँ अपने झूल रही हैं।

रानी केतकी की कहानी

अजी तुम तो इस रूप के साथ इस रव बेधड़क चले आए हो, ठंडे ठंडे चले जाओ।”

तब कुँवर ने मसोस के मलीला खाके कहा – “इतनी रूखाइयाँ न कीजिए।

मैं सारे दिन का थका हुआ एक पेड़ की छाँह में ओस का बचाव करके पड़ा रहूँगा।

बड़े तड़के धुँधलके में उठकर जिधर को मुँह पड़ेगा चला जाऊँगा।

कुछ किसी का लेता देता नहीं।

एक हिरनी के पीछे सब लोगों को छोड़ छाड़कर घोड़ा फेंका था। कोई घोड़ा उसको पा सकता था?

जब तलक उजाला रहा उसके ध्यान में था।

जब अँधेरा छा गया और जी बहुत घबरा गया, इन अमराइयों का आसरा ढूँढकर यहाँ चला आया हूँ।

कुछ रोक टोक तो इतनी न थी जो माथा ठनक जाता और रूका रहता।

सिर उठाए हाँपता चला आया। क्या जानता था – वहाँ पदि्मिनियाँ पड़ी झूलती पेगै चढ़ा रही हैं।

पर यों बदी थी, बरसों मैं भी झूल करूँगा।”

यह बात सुनकर वह जो लाल जोड़ेवाली सब की सिरधरी थी, उसने कहा –  “हाँ जी, बोलियाँ ठोलियाँ न मारो और इनको कह दो जहाँ जी चाहे, अपने पड़ रहें, और जो कुछ खाने को माँगे, इन्हें पहुँचा दो।

घर आए को आज तक किसी ने मार नहीं डाला।

इनके मुँह का डौल, गाल तमतमाए, और होंठ पपड़ाए, और घोड़े का हाँपना, और जी का काँपना, और ठंडी साँसें भरना, और निढाल हो गिरे पड़ना इनको सच्चा करता है।

बात बनाई हुई और सचौटी की कोई छिपती नहीं।

पर हमारे इनके बीच कुछ ओट कपड़े लत्ते की कर दो।”

रानी केतकी की कहानी

इतना आसरा पाके सबसे परे जो कोने में पाँच सात पौदे थे, उनकी छाँव में कुँवर उदैभान ने अपना बिछौना किया और कुछ सिरहाने धरकर चाहता था कि सो रहें, पर नींद कोई चाहत की लगावट में आती थी? पड़ा पड़ा अपने जी से बातें कर रहा था। जब रात साँय-साँय बोलने लगी और साथवालियाँ सब सो रहीं, रानी केतकी ने अपनी सहेली मदनबान को जगाकर यों कहा – “अरी ओ, तूने कुछ सुना है? मेरा जी उसपर आ गया है; और किसी डौल से थम नहीं सकता। तू सब मेरे भेदों को जानती है।

अब होनी जो हो सो हो; सिर रहता रहे, जाता जाय।

मैं उसके पास जाती हूँ। तू मेरे साथ चल।

पर तेरे पाँवों पड़ती हूँ, कोई सुनने न पाए।

अरी यह मेरा जोड़ा मेरे और उसके बनानेवाले ने मिला दिया।

मैं इसी जी में इस अमराइयों में आई थी।”

रानी केतकी मदनबान का हाथ पकड़े हुए वहाँ आन पहुँची, जहाँ कुँवर उदैभान लेटे हुए कुछ कुछ सोच में बड़बड़ा रहे थे।

मदनबान आगे बढ़के कहने लगी – “तुम्हें अकेला जानकर रानी जी आप आई हैं।”

कुँवर उदैभान यह सुनकर उठ बैठे और यह कहा – “क्यों न हो, जी को जी से मिलाप है?”

कुँवर और रानी दोनों चुपचाप बैठे; पर मदनबान दोनों को गुदगुदा रही थी।

होते होते रानी का वह पता खुला कि राजा जगतपरकास की बेटी है और उनकी माँ रानी कामलता कहलाती है।

“उनको उनके माँ बाप ने कह दिया है – एक महीने पीछे अमराइयों में जाकर झूल आया करो।

आज वही दिन था; सो तुम से मुठभेड़ हो गई।

बहुत महाराजों के कुँवरों से बातें आईं, पर किसी पर इनका ध्यान न चढ़ा।

तुम्हारे धन भाग जो तुम्हारे पास सबसे छुपके, मैं जो उनके लड़कपन की गोइयाँ हूँ, मुझे अपने साथ लेके आई है।

रानी केतकी की कहानी

अब तुम अपनी बीती कहानी कहो – तुम किस देस के कौन हो।”

उन्होंने कहा – “मेरा बाप राजा सूरजभान और माँ रानी लछमीबास हैं।

आपस में जो गँठजोड हो जाय तो कुछ अनोखी, अचरज और अचंभे की बात नहीं। योंही आगे से होता चला आया है।

जैसा मुँह वैसा थप्पड़। जोड़ तोड़ टटोल लेते हैं।

दोनों महाराजों को यह चितचाही बात अच्छी लगेगी, पर हम तुम दोनों के जी का गँठजोड़ा चाहिए।”

इसी में मदनबान बोल उठी – “सो तो हुआ।

अपनी अपनी अँगूठियाँ हेर फेर कर लो और आपस में लिखौती लिख दो।

फिर कुछ हिचर मिचर न रहे।

” कुँवर उदैभान ने अपनी अँगूठी रानी केतकी को पहना दी; और रानी ने भी अपनी अँगूठी कुँवर की उँगली में डाल दी; और एक धीमी सी चुटकी भी ले ली।

इसमें मदनबाल बोली – “जो सच पूछा तो इतनी भी बहुत हुई। मेरे सिर चोट है।

इतना बढ़ चलना अच्छा नहीं। अब उठ चलो और इनको सोने दो; और रोएं तो पड़े रोने दो।

बातचीत तो ठीक हो चुकी।

” पिछले पहर से रानी तो अपनी सहेलियों को लेके जिधर से आई थी, उधर को चली गई और कुँवर उदैभान अपने घोड़े को पीठ लगाकर अपने लोगों से मिलके अपने घर पहुँचे।

पर कुँवर जी का रूप क्या कहूँ। कुछ कहने में नहीं आता।

न खाना, न पीना, न मग चलना, न किसी से कुछ कहना, न सुनना।

जिस स्थान में थे उसी में गुथे रहना और घड़ी घड़ी कुछ सोच सोच कर सिर धुनना।

होते होते लोगों में इस बात का चरचा फैल गई।

किसी किसी ने महाराज और महारानी से कहा – “कुछ दाल में काला है।

वह कुँवर बुरे तेंवर और बेडौल आँखें दिखाई देती हैं।

घर से बाहर पाँव नहीं धरना। घरवालियाँ जो किसी डौल से बहलातियाँ हैं, तो और कुछ नहीं करना, ठंडी ठंडी साँसें भरता है।

रानी केतकी की कहानी

और बहुत किसी ने छेड़ा तो छपरखट पर जाके अपना मुंह लपेट के आठ आठ आँसू पड़ा रोता है।”

यह सुनते ही कुँवर उदैभान के माँ-बाप दोनों दौड़े आए। गले लगाया, मुँह चूम पाँव पर बेटे के गिर पड़े, हाथ जोड़े और कहा – ‘जो अपने जी की बात है, सो कहते क्यों नहीं? क्या दुखड़ा है जो पड़े पड़े कराहते हो? राज-पाट जिसको चाहो, दे डालो। कहो तो, क्या चाहते हो? तुम्हारा जी क्यों नहीं लगता? भला वह क्या है जो हो नहीं सकता? मुँह से बोलो, जी को खोलो। जो कुछ कहने से सोच करते हो, अभी लिख भेजो। जो कुछ लिखोगे, ज्यों की त्यों करने में आएगी। जो तुम कहो कूएँ में गिर पड़ो, तो हम दोनों अभी गिर पड़ते हैं। कहो – सिर काट डालो, तो सिर अपने अभी काट डालते हैं।”

कुँवर उदैभान, जो बोलते ही न थे, लिख भेजने का आसरा पाकर इतना बोले – “अच्छा आप सिधारिए, मैं लिख भेजता हूँ। पर मेरे उस लिखे को मेरे मुँह पर किसी ढब से न लाना। इसीलिए मैं मारे लाज के मुखपाट होके पड़ा था और आप से कुछ न कहना था।” यह सुनकर दोनों महाराज और महारानी अपने स्थान को सिधारे। तब कुँवर ने यह लिख भेजा – “अब जो मेरा जी होठों पर आ गया और किसी डौल न रहा गया और आपने मुझे सौ सौ रूप से खोल और बहुत सा टटोला, तब तो लाज छोड़ के हाथ जोड़ के मुँह फाड़ के घिघिया के यह लिखता हूँ –

चाह के हाथों किसी को सुख नहीं।

है भला वह कौन जिसको दुख नहीं।।

रानी केतकी की कहानी

उस दिन जो मैं हरियाली देखने को गया था, एक हिरनी मेरे सामने कनौतियाँ उठाए आ गई। उसके पीछे मैंने घोड़ा बगछुट फेंका। जब तक उजाला रहा, उसकी धुन में बहका किया। जब सूरज डूबा मेरा जी बहुत ऊबा। सुहानी सी अमराइयाँ ताड़ के मैं उनमें गया, तो उन अमराइयों का पत्ता पत्ता मेरे जी का गाहक हुआ। वहाँ का यह सौहिला है। कुछ रंडियाँ झूला डाले झूल रही थीं। उनकी सिरधरी कोई रानी केतकी महाराज जगतपरकास की बेटी हैं। उन्होंने यह अँगूठी अपनी मुझे दी और मेरी अँगूठी उन्होंने ले ली और लिखौट भी लिख दी। सो यह अँगूठी उनकी लिखौट समेत मेरे लिखे हुए के साथ पहुँचती है। अब आप पढ़ लीजिए। जिसमें बेटे का जी रह जाय, सो कीजिए।”

महाराज और महारानी ने अपने बेटे के लिखे हुए पर सोने के पानी से यों लिखा – “हम दोनों ने इस अँगूठी और लिखौट को अपनी आँखों से मला। अब तुम इतने कुछ कुढ़ो पचो मत। जो रानी केतकी के माँ बाप तुम्हारी बात मानते हैं, तो हमारे समधी और समधिन हैं। दोनों राज एक हो जायेंगे। और जो कुछ नाँह-नूँह ठहरेगी तो जिस डौल से बन आवेगा, ढाल तलवार के बल तुम्हारी दुल्हन हम तुमसे मिला देंगे। आज से उदास मत रहा करो। खेलो, कूदो, बोलो चालो, आनंदें करो। अच्छी घड़ी, सुभ मुहूरत सोच के तुम्हारी ससुराल में किसी ब्राह्मन को भेजते हैं; जो बात चीतचाही ठीक कर लावे।’ और सुभ घड़ी सुभ मुहूरत देख के रानी केतकी के माँ-बाप के पास भेजा।

रानी केतकी की कहानी

ब्राह्मन जो सुभ मुहूरत देखकर हड़बड़ी से गया था, उस पर बुरी घड़ी पड़ी। सुनते ही रानी केतकी के माँ-बाप ने कहा – “हमारे उनके नाता नहीं होने का! उनके बाप-दादे हमारे बापदादे के आगे सदा हाथ जोड़कर बातें किया करते थे और टुक जो तेवरी चढ़ी देखते थे, बहुत डरते थे। क्या हुआ, जो अब वह बढ़ गए, ऊँचे पर चढ़ गए। जिनके माथे हम बाएँ पाँव के अँगूठे से टीका लगावें, वह महाराजों का राजा हो जावे। किसी का मुँह जो यह बात हमारे मुँह पर लावे!” ब्राह्मण ने जल-भुन के कहा – “अगले भी बिचारे ऐसे ही कुछ हुए हैं।

राजा सूरजभान भी भरी सभा में कहते थे – हममें उनमें कुछ गोत का तो मेल नहीं। यह कुँवर की हठ से कुछ हमारी नहीं चलती। नहीं तो ऐसी ओछी बात कब हमारे मुँह से निकलती।” यह सुनते ही उन महाराज ने ब्राह्मन के सिर पर फूलों की चँगेर फेंक मारी और कहा – “जो ब्राह्मण की हत्या का धड़का न होता तो तुझको अभी चक्की में दलवा डालता।” और अपने लोगों से कहा – “इसको ले जाओ और ऊपर एक अँधेरी कोठरी में मँूद रक्खो।” जो इस ब्राह्मन पर बीती सो सब उदैभान के माँ-बाप ने सुनी। सुनते ही लड़ने के लिये अपना ठाठ बाँध के भादों के दल बादल जैसे घिर आते हैं, चढ़ आया। जब दोनों महाराजों में लड़ाई होने लगी, रानी केतकी सावन-भादों के रूप रोने लगी; और दोनों के जी में यह आ गई – यह कैसी चाहत जिसमें लोह बरसने लगा और अच्छी बातों को जी तरसने लगा।

रानी केतकी की कहानी

कुँवर ने चुपके से यह कहला भेजा – “अब मेरा कलेजा टुकड़े टुकड़े हुआ जाता है। दोनों महाराजाओं को आपस में लड़ने दो। किसी डौल से जो हो सके, तो मुझे अपने पास बुला लो। हम तुम मिलके किसी और देस निकल चलें; होनी हो सो हो, सिर रहता रहे, जाता जाय।”

एक मालिन, जिसको फूलकली कर सब पुकारते थे, उसने उस कुँवर की चिट्ठी किसी फूल की पंखड़ी में लपेट लपेट कर रानी केतकी तक पहुँचा दी। रानी ने उस चिट्ठी को अपनी आँखों लगाया और मालिन को एक थाल भर के मोती दिए; और उस चिट्ठी की पीठ पर अपने मुँह की पीक से यह लिखा – “ऐ मेरे जी के ग्राहक, जो तू मुझे बोटी बोटी कर के चील-कौंवों को दे डाले, तो भी मेरी आँखों चैन और कलेजे सुख हो। पर यह बात भाग चलने की अच्छी नहीं। इसमें एक बाप-दादे के चिट लग जाती है; और जब तक माँ-बाप जैसा कुछ होता चला आता है उसी डौल से बेटे-बेटी को किसी पर पटक न मारें और सिर से किसी के चेपक न दें, तब तक यह एक जो तो क्या, जो करोड़ जी जाते रहें तो कोई बात हमें रूचती नहीं।”

वह चिठ्ठी जो बिस भरी कुँवर तक जा पहुँची, उस पर कई एक थाल सोने के हीरे, मोती, पुखराज के खचाखच भरे हुए निछावर करके लुटा देता है।

और जितनी उसे बेचैनी थी, उससे चौगुनी पचगुनी हो जाती है।

और उस चिठ्ठी को अपने उस गोरे डंड पर बाँध लेता है।

आना जोगी महेंदर गिर का कैलास पहाड़ पर से और कुँवर

उदैभान और उसके माँ-बाप को हिरनी हिरन कर डालना

जगतपरकास अपने गुरू को जो कैलास पहाड़ पर रहता था, लिख भेजता है – कुछ हमारी सहाय कीजिए।

महाकठिन बिपताभार हम पर आ पड़ी है।

रानी केतकी की कहानी

राजा सूरजभान को अब यहाँ तक वाव बँहक ने लिया है, जो उन्होंने हम से महाराजों से डौल किया है।

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