रानी केतकी की कहानी भाग षष्ठ– इंशाअल्ला खाँ

ढूँढना गोसाई महेंदर गिर का कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप को न पाना और बहुत तलमलाना

यहाँ की बात और चुहलें जो कुछ है, सो यहीं रहने दो।

 अब आगे यह सुनो। जोगी महेंदर और उसके ९० लाख जतियों ने सारे बन के बन छान मारे,

पर कहीं कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप का ठिकाना न लगा।

 तब उन्होंने राजा इंदर को चिठ्ठी लिख भेजी।

 उस चिठ्ठी में यह लिखा हुआ था – ‘इन तीनों जनों को हिरनी हिरन कर डाला था। 

अब उनको ढूँढता फिरता हूँ। कहीं नहीं मिलते

और मेरी जितनी सकत थी, अपनी सी बहुत कर चुका हूँ। 

अब मेरे मुँह से निकला कुँवर उदैभान मेरा बेटा मैं उसका बाप

और ससुराल में सब ब्याह का ठाट हो रहा है। 

अब मुझपर विपत्ति गाढ़ी पड़ी जो तुमसे हो सके, करो।’

राजा इंदर चिठ्ठी का देखते ही गुरू महेंदर को देखने को सब इंद्रासन समेट कर आ पहुँचे और कहा – “जैसा आपका बेटा वैसा मेरा बेटा।

 आपके साथ मैं सारे इंद्रलोक को समेटकर कुँवर उदैभान को ब्याहने चढूँगा।”

गोसाई महेंदर गिर ने राजा इंद्र से कहा – हमारी आपकी एक ही बात है,

पर कुछ ऐसा सुझाइए जिससे कुँवर उदैभान हाथ आ जावे।

” राजा इंदर ने कहा – जितने गवैए और गायनें हैं, उन सबको साथ लेकर हम और आप सारे बनों में फिरा करें। कहीं न कहीं ठिकाना लग जाएगा।

” गुरू ने कहा – अच्छा।

हिरन हिरनी का खेल बिगड़ना और कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप का नए सिरे से रूप पकड़ना

एक रात राजा इंदर और गोसाई महेंदर गिर निखरी हुई चाँदनी में बैठे राग सुन रहे थे,

करोड़ों हिरन राग के ध्यान में चौकड़ी भूल आस पास सर झुकाए खड़े थे।

 इसी में राजा इंदर ने कहा – “इन सब हिरनों पर पढ़के मेरी सकत गुरू की भगत फूरे मंत्र ईश्वरोवाच पढ़ के एक एक छींटा पानी का दो।

” क्या जाने वह पानी कैसा था। छीटों के साथ ही कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप तीनों जनें हिरनों का रूप छोड़ कर जैसे थे वैसे हो गए। 

गोसाई महेंदर गिर और राजा इंदर ने उन तीनों को गले लगाया और बड़ी आवभगत से अपने पास

बैठाया और वही पानी घड़ा अपने लोगों को देकर वहाँ भेजवाया जहाँ सिर मंुडवाते ही ओले पड़े थे।

राजा इंदर के लोगों ने जो पानी के छीटें वही ईश्वरोवाच पढ़ के दिए तो जो मरे थे सब उठ खड़े हुए;

और जो अधमुए भाग बचे थो, सब सिमट आए।

 राजा इंदर और महेंदर गिर कुँवर उदैभान और राजा सूरजभान और रानी लक्ष्मीबास को लेकर एक उड़न

– खटोलो पर बैठकर बड़ी धूमधाम से उनको उनके राज पर बिठाकर ब्याह का ठाट करने लगे। 

पसेरियन हीरे-मोती उन सब पर से निछावर हुए।

राजा सूरजभान और कुँवर उदैभान और रानी लछमीबास चितचाही असीस पाकर फूली न समाई

और अपने सारे राज को कह दिया – “जेवर भोरे के मुँह खोल दो।

 जिस जिस को जो जा उकत सूझे, बोल दो। आज के दिन का सा कौन सा दिन होगा।

 हमारी आँखों की पुतलियों का जिससे चैन हैं,

उस लाडले इकलौते का ब्याह और हम तीनों का हिरनों के रूप से निकलकर फिर राज पर बैठना।

कहानी इंशाअल्ला खाँ की

 पहले तो यह चाहिए जिन जिन की बेटियाँ बिन ब्याहियाँ हों, उन सब को उतना कर दो जो अपनी जिस चाव चीज से चाहें; अपनी गुड़ियाँ सँवार के उठावें; और तब तक जीती रहें, सब की सब हमारे यहाँ से खाया पकाया रींधा करें। 

और सब राज भर की बेटियाँ सदा सुहागनें बनी रहें

सूहे रातें छुट कभी कोई कुछ न पहना करें और सोने रूपे के केवाड़ गंगाजमुनी सब घरों में लग जाएँ और सब कोठों के माथे पर केसर और चंदन के टीके लगे हों।

  जितने पहाड़ हमारे देश में हों, उतने ही पहाड़ सोने रूपे के आमने सामने खड़े हो जाएँ और सब डाँगों की चोटियाँ मोतियों की माँग ताँगे भर जाएँ;

और फूलों के गहने और बँधनवार से सब झाड़ पहाड़ लदे फँदे रहें; और इस राज से लगा उस राज तक अधर में छत सी बाँध दो।

जितने पहाड़ हमारे देश में हों, उतने ही पहाड़ सोने रूपे के आमने सामने खड़े हो जाएँ और सब डाँगों की चोटियाँ मोतियों की माँग ताँगे भर जाएँ;

फूलों के गहने और बँधनवार से सब झाड़ पहाड़ लदे फँदे रहें; और इस राज से लगा उस राज तक अधर में छत सी बाँध दो।

 और चप्पा चप्पा कहीं ऐसा न रहें जहाँ भीड़ भड़क्का धूम धड़क्का न हो जाय।

 फूल बहुत सारे बहा दो जो नदियाँ जैसे सचमुच फूल की बहियाँ हैं यह समझा जाय।

और यह डौल कर दो, जिधर से दुल्हा को ब्याहने चढ़े सब लाड़ली और हीरे पन्ने पोखराज की उमड़ में इधर और उधर कबैल की टटि्टयाँ बन जायँ और क्यारियाँ सी हो जायें जिनके बीचो बीच से हो निकलें।

 और कोई डाँग और पहाड़ी तली का चढ़ाव उतार ऐसा दिखाई न दे जिसकी गोद पंखुरियों से भरी हुई न हों।

कहानी इंशाअल्ला खाँ की

 राजा इंदर का कुँवर उदैभान का साथ करनाराजा इंदर ने कह दिया, ‘वह रंडियाँ चुलबुलियाँ जो अपने मद में उड़ चलियाँ हैं, उनसे कह दो – सोलहो सिंगार, बास गूँध मोती पिरो अपने अचरज और अचंभे के उड़न खटोलों का इस राज से लेकर उस राज तक अधर में छत बाँध दो।

 कुछ इस रूप से उड़ चलो जो उड़न-खटोलियों की क्यारियाँ और फुलवारियाँ सैंकड़ों कोस तक हो जायें।

 और अधर ही अधर मृदंग, बीन, जलतरंग, मुँहचग, घुँघरू, तबले घंटताल और सैकड़ों इस ढब के अनोखे बाजे बजते आएँ। 

उन क्यारियों के बीच में हीरे, पुखराज, अनवेधे मोतियों के झाड़ और लाल पटों की भीड़भाड़ की झमझमाहट दिखाई

इन्हीं लाल पटों में से हथफूल, फूलझड़ियाँ, जाही जुही, कदम, गेंदा, चमेली इस ढब से छूटने लगें जो देखनेवालों को छातियों के किवाड़ खुल जायें। 

और पटाखे जो उछल उछल फूटें, उनमें हँसती सुपारी और बोलती करोती ढल पड़े।

 और जब तुम सबको हँसी आवे, तो चाहिए उस हँसी से मोतियों की लड़ियाँ झड़ें जो सबके सब उनको चुन चुनके राजे हो जायें।

 डोमनियों के जो रूप में सारंगियाँ छेड़ छेड़ सोहलें गाओ। दोनों हाथ हिलाके उगलियाँ बचाओ।

 जो किसी ने न सुनी हो, वह ताव भाव वह चाव दिखाओ; ठुडि्डयाँ गिनगिनाओ, नाक भँवे तान तान भाव बताओ; कोई छुटकर न रह जाओ। ऐसा चाव लाखों बरस में होता है।

‘ जो जो राजा इंदर ने अपने मुँह से निकाला था, आँख की झपक के साथ वही होने लगा।

 और जो कुछ उन दोनों महाराजों ने कह दिया था, सब कुछ उसी रूप से ठीक ठीक हो गया।

 जिस ब्याह की यह कुछ फैलावट और जमावट और रचावट ऊपर तले इस जमघट के साथ होगी, और कुछ फैलावा क्या कुछ होगा, यही ध्यान कर लो।

कहानी इंशाअल्ला खाँ की

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *