वक्त का खिलौना मजदूर – Sagar kumar

वक्त का खिलौना मजदूर

पंच की प्रपंच से दूर हूं मैं
हां, मजबूर मजदूर हूं मैं
दो वक्त की रोटी की खातिर निकला था घर से
आज दो वक़्त की रोटी को मजबूर हूं मैं
हां, मजबूर मजदूर हूं मैं ।

आज सियासत गर्दो के हाथों का खिलौना बन गया
फिर जिंदगी के हाथों का बिजना (हाथ वाला पंखा) बन गया
आज इन लंबी सड़कों पर नंगे पैर चलने को मजबूर हूं मैं
हां , मजबूर मजदूर हूं मैं ।

टूट गए कुछ सपने, अब रातों को सोना छोड़ दिया
छूट गए कुछ अपने, किस्मत ने रुख़ यूं मोड़ दिया
फिर भी टूटे नहीं हौसले ,बस वक्त से मजबूर हूं मैं
हां, मजबूर मजदूर हूं मैं ।

इस जिंदगी की दौड़ में ,न जाने कब तक दौड़ लगाऊंगा
ए- सुन मेरी कर्म भूमि, मैं फिर से वापस आऊंगा
आज पास है सब मेरे , फिर भी सबसे दूर हूं मैं
हां, मजबूर मजदूर हूं मैं ।

Sagar kumar

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