सफर में हमसफ़र – लोकेश कुमार ‘रजनीश ‘

कहानी- सफर में हमसफ़र

“एक तो जून की भयंकर गर्मी और बसों में भीड़- दोनों ही जानलेवा हैं|”
दबी आवाज में बुदबुदाती हुई सरिता बस में चढ़ी |

पंजों पर उचक -उचककर सीट तलाशने लगी |काफी मशक्कत के बाद सबसे लास्ट में एक सीट मिल गई|

सरिता लोगों को धकेलते- धकेलते सीट पर जा बैठी|

उसी सीट पर बाजू में बैठा एक नवयुवक खिड़की से बाहर ना जने क्या देख रहा था|
उसकी गोद में बैठा सात आठ महीने का बच्चा सरिता की तरफ टकटकी लगाए देख रहा था|
सरिता उसे देख मुस्कुराई तो बच्चा भी अपनी निश्चल हँसी हँस दिया|
सरिता की सारी थकान दूर हो गई |
सरिता ने सीट से अपना सिर सटा लिया और थोड़ी ही देर में आँख लग गयी |

कुछ देर हुई कि बच्चा जोर जोर से रोने लगा |उसका पिता नरेश उसे चुप कराते कहने लगा -चुप हो जा, बेटा चुप हो जा, क्या हुआ??

बैग से निप्पल लगी दूध की बोतल निकाल कर बच्चे के मुंह में लगाई और दूध पिलाने लगा | लेकिन बच्चे ने जरा सी देर निप्पल लगा कर हटा दी और जोर जोर से रोने लगा|

नरेश लगभग रोते हुए जोर से कहने लगा- चुप हो जा, चुप हो जा, मैं कैसे संभालूं तुझे???

आवाज इतनी तेज थी कि सरिता गहरी नींद से जाग उठी|
पूछा- क्या हुआ? बच्चा क्यों रो रहा है?

नरेश- भूखा है|

सरिता -दूध की बोतल से दूध पिला दीजिए|

नरेश – बोतल का दूध गले नहीं उतरता|

सरिता – बच्चे की मां साथ नहीं आई? !

नरेश – दुनिया छोड़ चुके लोग कब साथ आते हैं?!!??

(कहते कहते नरेश के आंसू छलक पड़े )

(सरिता कांपती आवाज़ में बोली )

“कैसे हुआ यह सब”

नरेश- एक महीना पहले सीढ़ियों से गिरने से सिर में गहरी चोट आई और इसकी माँ हम दोनों को छोड़कर चली गई|

( बच्चा भूख से बिलबिला रहा था गला फाड़कर रो रहा था )

सरिता -बच्चे को मुझे दीजिए, मैं कोशिश करती हूं चुप कराने की|

नरेश ने बच्चे को सरिता की गोद में दिया, खुद फिर से बच्चे की मां की यादों में खो गया |

सरिता की गोद में जाते ही बच्चा चुप हो गया लेकिन भूख ने जोर मारा तो फिर रोने लगा|
कुछ देर तक सरिता बच्चे को चुप कराती रही|

यादों के भंवर के बीच नरेश ने ध्यान दिया कि बच्चे की रोने की आवाज अचानक आनी बंद हो गई है |

नरेश ने सरिता की तरफ देखा तो अवाक रह गया|

सरिता बच्चे को छाती से लगाकर दूध पिला रही थी|

यह सब देख नरेश बोला- तुम यह सब !!!!??

सरिता -बच्चे को भूख से बिलखते देखकर मुझसे रहा नहीं गया |
बच्चे को अपना दूध पिलाते जो सुख, जो आनंद मिल रहा है ;उससे मेरी ममता तृप्त हो गई |

(नरेश जोर जोर से रोने लगा)

सरिता नरेश का हाथ पकड़कर बोली – शादी के बाद मैं भी अकेली हूं और तुम भी|
चाह कर भी तुम्हारी पत्नी की जगह नहीं ले सकती मगर क्या हम इस बच्चे की खातिर हमसफर बन सकते हैं?????

नरेश के निरंतर बहते आंसू और कांपते होठों से सरिता को माथे से चूम लेना मौन सहमति बने|

लेखक- लोकेश कुमार ‘रजनीश’

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