सावन-पीर – लोकेश कुमार ‘रजनीश ‘

बादल गरजे बिजली चमके पड़ने लगी फुहार|
जाने कौन देश जाकर बसे मेरे भरतार||

नन्हीं पड़े फुहार याद पिया की आई|
नैना बरसे मेह विरह ने ली अंगड़ाई||

कोयल कूके कू कू मन को रही हरषाय |
बेगी बेगी आए मिलो गोरी रही बुलाय ||

बीते दिनों को याद कर काया गई मेरी सूख|
पिया बिना चैन नहीं प्यास लगे ना भूख||

चढ़ चौबारे टेर लगाऊँ बादल रही समुझाय |
मीत तभी सांचौ जानूं जब पिया आन मिलाय ||

सुनो सखी बिजली प्यारी कर दीजो उजियार|
भटक जाए ना पथ पिया, राह बड़ी अंधियार ||

कामदेव के पांच तीर तन में काम जगाय |
सावन की रिमझिम सखी काम को रही बढ़ाय||

काली घटा अंबर छाई होने लगी अंधियारी|
मूसलधार बरसन लागी तड़पे प्राणन प्यारी||

एक दफा रूठ गई तुम जीवन भर पछताओगे|
तीन दिनन में घर नहीं आए जीवित ना पाओगे||

–लोकेश कुमार “रजनीश”

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